For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक तवायफ की दास्तान

कितनी बदली हुई तकदीर नज़र आती है--ये जवानी मेरी तस्वीर नज़र आती है !!


                    
                                                         हमने सोचा न था हालात कुछ ऐसे होंगे !
                                                        हम जिन्हें अपना समझते थे पराये होंगे !!
                                                         अपनी  दुनिया में अँधेरे ही अँधेरे होंगे !
                                                       रहके महफ़िल में भी हम इतने अकेले होंगे !!

 


हर तरफ रंज की तदबीर नज़र आती है ---कितनी बदली हुई तकदीर नज़र आती है !!


                      
                                                       चन्द लम्हों के लिए लाश को जिंदा करके !
                                                      अपनी दौलत से मेरे जिस्म का सौदा करके!! 
                                                        मेरी इज्ज़त का सरे आम तमाशा करके !
                                                    क्या मिला तुमको भरी बज़्म में रुसवा करके !!

 


अपनी पायल मुझे ज़ंजीर नज़र आती है----कितनी बदली हुई तकदीर नज़र आती है !!




                                                यूँ न घुट घुट के जिया करती न उलझन होती !
                                                      मेरा अरमान था के मै भी  सुहागन होती !!
                                                        मेरे चेहरे पे पड़ी शर्म की चिलमन होती !
                                                       कोई जो अक्स मेरा होता मै दरपन होती !!

 

आज ख्वाबों की न ताबीर नज़र आती है -- कितनी बदली हुई तकदीर नज़र आती है !!

 

Views: 1105

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Er. Ambarish Srivastava on November 1, 2011 at 10:47pm

भाई हिलाल अहमद हिलाल जी ! इस खूबसूरत नज़्म के जरिये आपने इक तवायफ की सारी जिन्दगी एक चलचित्र की तरह पेश कर दी है ! इस के लिए आपको दिली मुबारकबाद !

Comment by Hilal Badayuni on November 1, 2011 at 3:00pm

shukriya satsh sahab aur rohit ji..............

Comment by Rohit Sharma on November 1, 2011 at 9:59am
Achchhi rachna hai, badhai
Comment by satish mapatpuri on November 1, 2011 at 2:28am

चन्द लम्हों के लिए लाश को जिंदा करके !

                                                      अपनी दौलत से मेरे जिस्म का सौदा करके!!
                                                        मेरी इज्ज़त का सरे आम तमाशा करके !
                                                    क्या मिला तुमको भरी बज़्म में रुसवा करके !!

सुभान अल्लाह .................. बहुत खूब

Comment by Hilal Badayuni on October 31, 2011 at 4:17pm

shukriya bhai arun ji 

mujhe lag raha hai ek aap hi ki sakriyata chal rahi hai obo me....baqi dost kaha gaye mere

Comment by Abhinav Arun on October 31, 2011 at 12:51pm

Hilaal ji ek shaandaar rachn ke liye hardik mubaraqwaad aapko . bahut saral sahaj alfaaz men tawayaf ki dastaan bayan kar di aapne waah !!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"किसने कहा छंद स्वर आधारित 'ही' हैं। तब तो शब्दों के अशुद्ध उच्चारण करने वाले छांदसिक…"
11 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । स्पर्शों में…"
14 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय विजय निकोर जी, एक अरसे बाद आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ. एकान्त और अकेलापन के बीच के अन्तर को…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार ।सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।। ............ क्या…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"इस स्नेहिल अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी. "
yesterday
vijay nikore posted a blog post

सुखद एकान्त है या है अकेलापन

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनीइठलाता पवन, मतवाला पवनतरू तरु के पात-पात परउमढ़-उमढ़ रहा उल्लासमेरा मन…See More
yesterday
vijay nikore added a discussion to the group English Literature
Thumbnail

LONELINESS

LonelinessWrit large,born out of disconnectbetween me and my Self,are slivers of Timewhere there is…See More
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

अपना बबुआ से // सौरभ

 कतनो सोचऽ फिकिर करब ना जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी कवनो नाता कवना कामें बबुआ जइबऽ जवना गाँवें जीउ…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। उत्तम नवगीत हुआ है बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
Friday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-129 (विषय मुक्त)
"चमत्कार की आत्मकथा (लघुकथा): एक प्रतिष्ठित बड़े विद्यालय से शन्नो ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ…"
Jan 1
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-129 (विषय मुक्त)
"नववर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं समस्त ओबीओ परिवार को। प्रयासरत हैं लेखन और सहभागिता हेतु।"
Jan 1, 2026

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ

सूर्य के दस्तक लगाना देखना सोया हुआ है व्यक्त होने की जगह क्यों शब्द लुंठित जिस समय जग अर्थ ’नव’…See More
Jan 1, 2026

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service