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क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार में !!

हमको  रहना  चाहिए  अब  सोह्बते  तलवार  में !

क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार  में !!

जब  तलक  उलझा  रहेगा  दामने  दिल  खार  में !
हम  सुकू  से  रह  नहीं  पाएंगे  इस  गुलज़ार  में  !!

नकहते  गुल  सुबहे  नौ शम्सो  कमर  अंजुम  जिया ! 
नेमतें  क्या  क्या  छुपी  है  यार  के  दीदार  में !!

मुद्दतो  जिस  सांप  को  हमने  पिलाया  खूने  दिल !
वो  डराना  चाहता  है  हमको  इक  फुस्कार  में !!

रोजो  शब्  मसरूफियत  कुछ  इस  क़दर  बढ़ने  लगी !
शायरी  को  वक़्त  मिल  पाता  है  बस  इतवार  में !!

तालिबे  शर्म  ओ  हया  हम , आप  उरयानी  पसंद !
फर्क  कितना  है  हमारे  आपके  त्यौहार  में !!

जैसा  रिश्ता  माँ  में  और  बेटे  में  होता  है  'हिलाल'  
है  फ़क़त  वैसा  ही  रिश्ता  फन  में  और  फनकार  में !! 
 

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Comment by Hilal Badayuni on October 24, 2011 at 4:29pm

shukriya brij bhushan ji aur saurabh ji


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Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2011 at 4:04pm

इस ग़ज़ल के लिये मुबारकां .. सारे अश’आर बखूबी रंगभरे निखरे हैं.

बधाई

Comment by Brij bhushan choubey on October 24, 2011 at 12:48pm

जब  तलक  उलझा  रहेगा  दामने  दिल  खार  में !
हम  सुकू  से  रह  नहीं  पाएंगे  इस  गुलज़ार  में  !!.aha kya bat hai.... bahut khub bahut khua lajvab sher.

Comment by Hilal Badayuni on October 22, 2011 at 9:57pm
bahut bahut shukriya

aashish ji shashi ji aur ambrish sahab jo aapne ashaar pasand kiye aur mujhe duaon se nawaza...
Comment by आशीष यादव on October 19, 2011 at 7:24pm

आदरणीय हिलाल सर,

मै पहले से ही आपकी शायरी का कायल हूँ| आज फिर से आपने एक बेहतरीन ग़ज़ल पेश की है| हर एक शेर खुद में मुकम्मल है| क्या कमाल की बात कही है आपने| 

Comment by Shashi Mehra on October 19, 2011 at 7:10pm

हमको  रहना  चाहिए  अब  सोह्बते  तलवार  में !

क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार  में !!

bahut khub

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 19, 2011 at 12:39pm

//तालिबे  शर्म  ओ  हया  हम , आप  उरयानी  पसंद !

फर्क  कितना  है  हमारे  आपके  त्यौहार  में !!//

भाई हिलाल जी ग़ज़ल अच्छी कही है ! मज़ा आ गया ! इसके लिए आपको बहत-बहत मुबारकबाद !
Comment by Hilal Badayuni on October 17, 2011 at 2:24am

shukriya bhai arun ji jo aapki muhabbatein mili is ghazal ko

Comment by Abhinav Arun on October 16, 2011 at 12:33pm
 अच्छी ग़ज़ल हिलाल जी | काफिये को बखूबी निभाया आपने कई शेर बेहतरीन और संदेशपरक भी बन पड़े है ! हार्दिक बधाई !!

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