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मैने सहस्त्रो आमन्त्रण भेजे तुम्हे

 

 

 

मैने सहस्त्रो आमन्त्रण भेजे तुम्हे
आखिर कब आओगे ?

पिछली बारिश में , भीगते हुए राह देखता रहा
बारिस आई और गई , और मन तरसता रहा
रातभर झींगुरों के ताने और कीटो की चिकोटी
अपने दिल को तुम्हारा समझ कही खरी खोटी

पोष की सर्द रातों में रातभर आँखे बिछाई मैने
तब तेरे इन्तजार में ढेरों नींद गँवाई मैने
पत्थर बन चूका हूँ सर्द हवा के थपेड़ों से
और अब ओस बन लटक रह हूँ पेड़ो से

गर्मी की तपती दुपहरी में भी तेरा रस्ता देखा है
मगर हरबार की तरह निष्ठुर को हँसता देखा है
हर मोसम में जला है दिल तेरे इन्तजार में
विश्वास उठ रहा है अब यार-ये-इकरार से
मगर .....
आमन्त्रण भेजता रहूँगा ,.....
मरते दम तक ....
क्योंकि....,
अब भी....,
सवाल वही है ...,
आखिर कब आओगे ?



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Comment

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Comment by आशीष यादव on December 2, 2011 at 11:53pm

bhawpurn rachna. bahut achchhi lgi . 

badhai.

Comment by Lata R.Ojha on December 2, 2011 at 6:47pm

मगर .....
आमन्त्रण भेजता रहूँगा ,.....
मरते दम तक ....
क्योंकि....,
अब भी....,
सवाल वही है ...,
आखिर कब आओगे ?

KHOOBSOORAT ABHIVYAKTI...

peer mann ki sahte jaenge..prashn har pal ye hi dohraenge ..aakhir kab aaoge ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 28, 2011 at 10:14pm

एके राजपूत साहब,  भावपूर्ण रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

 

Comment by Abhinav Arun on November 28, 2011 at 8:33pm

सारगर्भित और दिल की तह को छूने में सक्षम र्रचना हेतु बधाई !!

Comment by Shyam Bihari Shyamal on November 28, 2011 at 7:13am

वाह... जीवंत... भावपूर्ण रचना... 

कृपया ध्यान दे...

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