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एक सुबह ना जाने क्या हुआ
ऐसा लगा की सुबह तो रोज़ होती है ,

पर आज अलग कुछ बात है
इन हवाओं में घुली है शरारत,

जैसे इन्होने छोड़ी है शराफ़त
ज़रूर कोई छुपा हुआ राज़ है
निकला जो घर से , तो देखा फूलों को मुस्कुराते हुए
गुलाब तो रोज़ होते थे आँगन में,

पर अब इस मौसम मे कोई गुलाबी सा एहसास है
सूरज तो आज भी था

लेकिन फिर भी कल रात के चाँद की शीतलता सी मौजूद थी वातावरण मे
धीरे धीरे एहसास हुआ

कि आज मुस्कुराने को जी चाह रहा है
किसी के लौट के आने का एहसास ,

मन के प्रांगण को विलासित कर रहा है
इस भोर में फैला हे विभोर

जो जग को उर्जावान बना रहा है
घर से जो निकला कुछ दूर तो ठिठुरन सी होने लगी
कल तक जो सड़क थी, घने वन सी लगने लगी
नज़र गई एक वृक्ष के तने पर ,

दूर देश से कोई पंछी आया मेहमान बनकर
ओझल सी दिखने लगी उस पार की चाय की गुमटी,

ऐसा लग रहा था जैसे बादल भूल कर् नभ का रास्ता
, आ गये हो धरती पर
जैसे ही मैने चाय का प्याला हाथ मे लिया ,

होठों से पहला घूँट जो पिया ,
इस चाय मे एक अलग ही बात थी,
जैसे ढोलक की ताल पे वो राग-मल्हार थी
जैसे-जैसे दिन चढ़ा,

वैसे-वैसे उसका नशा और बढ़ता गया
निशा में एक चाँदनी थी और एक वो थी
दोनो का शबाब सर चढ़ के बोल रहा था
इस नशे ने ऐसा पागल किया 

कि बिन साज़ के गीत गूंजने लगे ,

बिन फूलों के सब महकने लगे
अब हमसे भी रहा ना गया ,

थमा रज़ाई का दामन,

और फिर ख्वाबों को नींदों में छिपा लिया |
कुछ ऐसा था सर्दी का आगाज़ ||










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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 9, 2012 at 4:04pm

mujhko thand lag rahi hai, ek pyala chye ho jaye. 

Comment by Abhinav Arun on December 17, 2011 at 8:15pm

सर्दी के आगाज़ का बहुत सुन्दर चित्र खींचा है रोहित जी हार्दिक बधाई !! कविता एक सकारात्मक भाव लिए हुए है उसे नमन है |

आपकी भाषा और शब्द चयन शिल्प सबकुछ बहुत सशक्त है लिखते रहिये - ये पंक्तियाँ -

मन के प्रांगण को विलासित कर रहा है
इस भोर में फैला हे विभोर

मन को भा गयीं हार्दिक बधाई !!

Comment by Rohit Dubey "योद्धा " on December 14, 2011 at 12:24pm
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