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सवाल करता बहुत देता उसे कोई जवाब नहीं


सवाल करता बहुत देता उसे कोई जवाब नहीं 
पढ़े कैसे वो दुनिया ने दी उसे कोई किताब नहीं

स्कूल की खिडकियों पे लगाए  कान सुनता है 
अगर अन्दर पनपते फूल क्या वो गुलाब नहीं 

जूठे बर्तन धोते हुए पूरा बचपन बिताता है 
लोग अब भी कहते दुनिया इतनी ख़राब नहीं 

मिलती उसे पूरी रोटी नहीं भूखा सोता है वो 
जब पेट करे आवाज़ रातो को आते ख्वाब नहीं 

जरा से दर्द पे छलक जाती है आंखे "सैनी" 
वो तो बच्चे है उनके गमो का कोई हिसाब नहीं

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Comment by shashiprakash saini on January 6, 2012 at 5:17pm

धन्यवाद योगराज सर 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 6, 2012 at 11:16am

सुन्दर कथ्य, सुन्दर विचार और सार्थक सन्देश. बधाई स्वीकार करें. 

Comment by shashiprakash saini on January 2, 2012 at 9:56pm

शुक्रिया गणेश जी 

 बेबहर  से बाबहर की ओर कोशिश जरी है 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 2, 2012 at 9:51pm

सैनी साहब, बहुत ही खुबसूरत कहन को निभाया है अपनी ग़ज़ल में, रदीफ़ काफिया का प्रयोग बढ़िया है, मुझे लगता है बहर पर और काम करने की आवश्यकता है, बहरहाल दाद स्वीकार करे इस प्रस्तुति पर |

Comment by shashiprakash saini on January 2, 2012 at 1:22pm

धन्यवाद राजपूत जी 

Comment by AK Rajput on January 2, 2012 at 11:47am
हर जगह बचपन को ऐसे ही कुचलते हुए देखा जा सकता है , मानवता के नामं पे एक कलंक 
है बाल मजदूरी. बहुत मार्मिक रचना    

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