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मेरे गाँव का रामलू .बचपन से ही जरा आपराधिक प्रवृत्ति का था.बड़ा हुआ तो पुलिस यदा-कदा उसके पीछे रहती थी. कुछ दिनों बाद वह गायब हो गया.कालान्तर में एक घटना हुई .मै शहर किसी काम से गया.वहां किसी बाबा का प्रवचन चल रहा था.उत्सुकतावश ,भीड़ देख मै भी पंडाल में घुस गया.कड़ा पहरा था मंच के इर्द-गिर्द.बाबा पे मेरी नज़र पड़ी तो मै..अवाक्!!! अरे!ये तो अपना रामलू ही है!!!! इतना बदल गया!!
जो नहीं बदला वो ये कि-मंच पर पुलिस अब भी उसके पीछे थी.
--अविनाश बागडे.

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2012 at 10:26pm

जो नहीं बदला वो ये कि-मंच पर पुलिस अब भी उसके पीछे थी.

इस कथा की इस एक पंक्ति ने समाज के विद्रुप माहौल के तार-तार सामने रख दिये.  बहुत सजीव कथा.

हार्दिक बधाई, अविनाश भाई.

 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 7, 2012 at 9:19pm

आदरणीय बहुत सुन्दर लघु कथा कही है.थोड़े से शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी, बधाई स्वीकार करें.

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