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गीत विरह के 

जिसनें जीवन के सुन्दर पल

साथ हमारे काटे थे
क्या खबर थी उनके जीवन में
बस  काँटे  ही काँटे  थे
 
हम बेबस थे,थे लाचार
कैसे जताते अपना प्यार
हमनें तो कुछ गीत विरह के 
अपने लिए ही छांटे थे
 
हम भी तन्हा तुम भी तन्हा
तन्हाई ही सहारा है
हमने तो खुशियों के खज़ानें 
इस दुनियाँ को बांटे थे
 
ऐसा नहीं तुम्हें भूल गए
या तुमको ढूँढा ही नहीं
मेरे दिल से पूछो जिसे तुम 
अक्सर ही याद आते थे 
अक्सर ही याद आ-----

दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
१७/०१/१२.
9350078399

मेरी यह कविता मेरे बचपन के एक ऐसे  दोस्त मित्र के लिए है  जिसे हमनें कभी उदास नहीं देखा लेकिन खुदा ने उसके जीवन में आँसू ही आँसू भर दिए I हम चाहकर भी उसके लिए अब कुछ नहीं कर सकते I यह हमारी बदनसीबी है I

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on February 4, 2012 at 9:59am
आशुतोष जी..........
ज़िन्दगी अपनी यादों की एक खुली किताब सी है 
समेटे हुए हैं इसमें अपने आस पास का दर्द
इनको खोलनें से पहले बस इतना ख्याल रखना
आपके अश्क ढल न जाएँ दर्द मेरा देखकर ......
दीपक 'कुल्लुवी' 
shukriya
Comment by Deepak Sharma Kuluvi on January 23, 2012 at 5:34pm

ashish ji 

kavita aapke dil ko chho gayi to hamare dil ka dekhiye kya haal hua hoga...?

dhanyabad

Comment by आशीष यादव on January 22, 2012 at 6:50pm

आदरणीय  श्री DEEPAK SHARMA KULUVI जी , बहुत ही भावुक कविता है| बिलकुल सरल सहज  शब्दों में लेकिन दिल  को छूती हुई|

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on January 17, 2012 at 4:41pm
सौरभ जी आपका आशीर्वाद हमेशा साथ है....
बिल्कुल सत्य कहा आपने .....

था इंतज़ार मौत का जब जिंदगी बेहाल थी
अब ज़िन्दगी कुछ संभली थी तो मौत आ गयी

दीपक कुल्लुवी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2012 at 4:34pm

दीपकजी,  संवेदना की उफनायी बाढ़ में बहुत देर तक बहता रहा.  बेरोक-टोक.  कुछ संयत हुआ तो इतना ही कह पा रहा हूँ  --ज़िन्दग़ी में बहुत कुछ ऐसा हुआ करता है, जिसे चाह कर भी शब्दों में नहीं ढाला जा सकता.  मगर इन्सान फिर भी कोशिश करता है.

शुभकामनाएँ.

 

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on January 17, 2012 at 3:56pm
नीरज जी...धन्यवाद..

न हसेंगे खुशियों में न रोएँगे हम गम में
हमनें तो हर हाल में जीने की कसम खा ली ...

दीपक कुल्लुवी

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on January 17, 2012 at 3:36pm
प्रभाकर जी शुक्रिया......
न जानें कौन से गम का रिश्ता निभाते हैं यह चिराग
रहता हूँ जब तक होश में जलते हैं मेरे साथ........

कुल्लुवी

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 17, 2012 at 3:30pm

विरह को सुन्दरता से शब्दों में ढाला है आदरणीय दीपक जी - बहुत खूब.

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