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लघु कथा : हाथी के दांत 

बड़े बाबू आज अपेक्षाकृत कुछ जल्द ही कार्यालय आ गए और सभी सहकर्मियों को रामदीन दफ्तरी के असामयिक निधन की खबर सुना रहे थे. थोड़ी ही देर में सभी सहकर्मियों के साथ साहब के कक्ष में जाकर बड़े बाबू इस दुखद खबर की जानकारी देते है और शोक सभा आयोजित कर कार्यालय आज के लिए बंद करने की घोषणा हो जाती है | सभी कार्यालय कर्मी इस आसमयिक दुःख से व्यथित होकर अपने अपने घर चल पड़ते  है | बड़े बाबू दफ्तर से निकलते ही मोबाइल लगा कर पत्नी से कहते है "सुनो जी तैयार रहना मैं आ रहा हूँ, आज  सिनेमा देखने चलना है"

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2012 at 8:39pm

आदरणीय भ्रमर जी, आपसे सराहना पाकर श्रम सार्थक हुआ , आभार आपका |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2012 at 8:37pm

आदरणीया सरिता जी, दरअसल मैं यह समझता हूँ कि लेखक स्वयम कुछ नहीं लिखता बल्कि माँ सरस्वती जब चाहती है तो लिखवा लेती है, मुझपर माँ अपनी कृपा कुछ अंतराल पर करती रहती है :-)))))

सराहना हेतु आभार आपका |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2012 at 8:34pm

आदरणीय अविनाश बागडे जी, लघु कथा पसंद करने हेतु आभार |

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 15, 2012 at 7:44pm

सभी कार्यालय कर्मी इस आसमयिक दुःख से व्यथित होकर अपने अपने घर चल पड़ते  है | बड़े बाबू दफ्तर से निकलते ही मोबाइल लगा कर पत्नी से कहते है "सुनो जी तैयार रहना मैं आ रहा हूँ, आज  सिनेमा देखने चलना है"

प्रिय बागी जी ..सच को उकेरती रचना ...शीर्षक अच्छा रहा हाथी के दांत .सांप के काटने पर एक युवा की मौत ....मरने पर इकठ्ठा हुए लोग -रोते बिलखते सगे संबंधी एक बाबूजी कंघा निकाल अपना बाल संवारने में लगे थे ....

भ्रमर ५ 


Comment by Sarita Sinha on April 13, 2012 at 6:19pm

गणेश जी नमस्कार, 

बहुत दिनों के अंतराल पर आप लिखते हैं, लेकिन बहुत सटीक व्यंग्य किया है, शोक सभाओं की असलियत पर...
Comment by AVINASH S BAGDE on March 23, 2012 at 8:33pm

हाथी के दांत 

आदरणीय बागी जी
हमारी व्यवस्था की ये नग्न सच्चाई है.
हाथी के दांत या घड़ियाल के आंसू 
ये एक शोकांतिका है समाज की.
बहुत ही करारा व्यंग्य बाण चलाती हुई एक सार्थक लघु-कथा.
साधुवाद.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2012 at 12:46pm

अब मैं सभी सदस्यों से साग्रह अनुरोध है कि वर्तमान थ्रेड ’हाथी के दाँत’  पर इस थ्रेड के अलावे की बातचीत एकदम से बंद हो.

सादर

Comment by वीनस केसरी on March 23, 2012 at 12:46pm

रवीन्द्र जी,
आपने बिलकुल सही कहा श्रेष्ठवर

मेरी अंतरात्मा मुझे कचोटने लगी मैं बहुत बेचैन हो गया था, मैं टूट कर बिखर ही जाता फिर मुझे आपकी बातें याद आई तो मन को चैन मिला

आपने ही मुझे रास्ता दिखाया है
अप मेरे राहबर हैं
गुरुवर
अब तक मैंने इस मंच पर केवल एक बार ही किसी को बहुत पहले शाष्टांग दंडवत प्रणाम किया था
अब मैं आपको शाष्टांग दंडवत प्रणाम करता हूँ

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2012 at 12:43pm

आदरणीय रवींद्रजी,  आपका सादर आभार कि आपकी कौतुक-कला से माहौल मनसायन हुआ है.. .  :-))))

हाँ, साहबजी, आपने सही अंदाज़ लगाया है. यहाँ ओबीओ के मंच पर अवश्य ही एक भरा-पूरा गुट है जिसके पुरोधा प्रधान-सम्पादक आदरणीय योगराजभाईसाहब हैं. इस गुट के अनुयायी वे सभी सदस्य हैं, जिन्हें ’सीखने-सिखाने’ के क्रम में लक्ष्मण का अविवेक नहीं, राम की नम्रता अनुकरणीय लगती है. साथ ही, जिन्हें ओबीओ का मंच अपने रचनाकर्म हेतु उपयुक्त और सकारात्मक मंच लगता है.  इसके अलावे किसी अन्य गुट को इस मंच पर अभी तक अधिक दिनों बने रहे नहीं देखा गया है.

दूसरे, साहबजी, किसी रचना को फिचरिंग करने का सर्वाधिकार आदरणीय प्रधानसम्पादक के हाथों में है और उनका यह निर्णय कई-कई विन्दुओं पर निर्भर करता है जिसमें काल-खण्ड की प्रतिबद्धता भी एक विन्दु है.  इसके अलावे भी, एक सुघटना को किसी दुर्घटना के परिप्रेक्ष्य में हम न ही देखें.  .. . हा हा हा हा ...

आप सभी तो अभी आये हैं, थोड़ा रुकिये, परखिये और फिर ओबीओ के सर्वमान्य एग्झिस्टिंग गुट का हिस्सा बन जाइये. देखियेगा, आप बहुत कुछ कहने से बच जायेंगे... हा हा हा हा...

पुनः, आपका हृदय से सादर आभार, आदरणीय.

Comment by Arun Sri on March 23, 2012 at 12:25pm

इस विषय पर मैं अपने विचार नही रखना चाहता था ! क्योकि मुझे नही लगा कि इससे साहित्य का कोई लाभ होने वाला है ! और मैं उतना ज्ञानी भी नही हूँ कि विद्वानों के बीच बोल सकूँ ! लेकिन वीनस केसरी जी की एक बात पढकर चुप न रह सका

//परन्तु अब मैं आप सभी को आश्वस्त करता हूँ कि आप सभी श्रेष्ठवर में जब तक कोंई शिल्प पर बात नहीं करना चाहेगा मैं स्वयं चर्चा नहीं करूँगा न ही आप लोगों की रचनाओं में शिल्पगत आधार पर कमेन्ट करूँगा // (यदि ये बात रेखांकित सहभागियो के अलावा पुरे मंच के लिए है तो और भी कष्टकर )

वीनस जी से कहना चाहूँगा ये साहित्य के हित में नही है ! आप गज़ल विधा के जानकार है ! आप चर्चा नही करेंगे तो नए और सिखने आने वाले सहभागियों का ज्ञानार्जन कैसे होगा ? क्योकि  नए लोग जो आपको नही जानते वो आपको चर्चा के लिए आमंत्रित नही कर सकेंगे ! और उस ज्ञान से वंचित रह जाएँगे जो वो आपसे प्राप्त कर सकते थे ! अनुरोध है वीनस जी , पुनः विचार करें ! क्षमासाहित !

कृपया ध्यान दे...

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