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वेदर्द 

मेरी ज़िन्दगी मुझसे रूठी रही

हम मनाते रहे वोह रुलाती रही 
दूर जाने की कोशिश बहुत की मगर
याद उनकी  तो अक्सर ही  आती रही 
भूलना भी न था  हम भी करते तो क्या
बेवफाई से बेहतर था अपना गुनाह 
हम तो रस्म-ए-वफ़ा ही निभाते रहे
तोहमतें दुनियां हमपे लगाती रही
दीपक 'कुल्लुवी' तू कब होश में आएगा
तू तन्हा था तन्हा ही रह जाएगा
ज़िक्र तेरा कहीं भी न आएगा दोस्त 
गीत तेरे ही दुनियाँ यूँ गाती रही 
दीपक 'कुल्लुवी'
२२/३/१२.

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 23, 2012 at 1:17pm

 rajesh kumari ji thank-you very much

deepak


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Comment by rajesh kumari on March 23, 2012 at 12:19pm

dil ki gahraaiyon se nikle bhaav bahut sundar prastuti.

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 23, 2012 at 12:03pm

KASHIVASI JI

RACHANA KE BHAV ACHHE LAGE SHUKRIYA....

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 23, 2012 at 11:59am

आपकी इस रचना के भाव बहुत अच्छे हैं| सादर,

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 23, 2012 at 10:20am
शैलंदर,नीरजा,प्रदीप जी  आप सबका धन्यबाद 

आप जैसे दोस्तों का प्यार मुहब्बत है जो कलम चलती रहती है.....कुछ अच्छा तो कुछ बुरा निरंतर लिखती रहती है

दीपक कुल्लुवी
Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 23, 2012 at 10:00am
हम तो रस्म-ए-वफ़ा ही निभाते रहे
तोहमतें दुनियां हमपे लगाती रही
अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 22, 2012 at 8:42pm

भूलना भी न था  हम भी करते तो क्या

बेवफाई से बेहतर था अपना गुनाह 
हम तो रस्म-ए-वफ़ा ही निभाते रहे
bahut khoob. badhai mahoday ji sadar. 

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