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मत जाओ ! मत जाओ !

कैसे कहें हम उनसे कि आज, मत जाओ,
नज़रों से सुनो दिल के जज़्बात, मत जाओ;
हम जानते हैं तुमको दिल का हाल पता है,
तुम जानते हों मेरा इजहार खता है;
हमको है फिर भी तेरा ऐतबार, मत जाओ,
आँखों से सुनो आँखों की बात, मत जाओ;
अपने ही दिल पे तुमने लगा रखे हैं पहरे,
अन्तर में दबी सी कहीं तूफ़ान की लहरें;
अब तोड़ भी दो डर की ये दीवार, मत जाओ,
आने दो लबों तक भी अब ये बात, मत जाओ |

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 23, 2012 at 10:11am

अपने ही दिल पे तुमने लगा रखे हैं पहरे,
अन्तर में दबी सी कहीं तूफ़ान की लहरें;

बहुत ही सुन्दर कृति पर बढाई स्वीकार करें

Comment by अश्विनी कुमार on March 23, 2012 at 12:09am

प्रिय स्नेही अनुज ,,मै तो हमेशा दिल के जज़्बात को ही देखुंगा  :)  अति सुंदर भावों को अपने अंतर में समाहित करती हुई  कविता ||जय भारत ||

Comment by Harish Bhatt on March 23, 2012 at 12:04am

चातक जी सादर प्रणाम

बहुत ही शानदार कविता 

कैसे कहें हम उनसे कि आज, मत जाओ,
नज़रों से सुनो दिल के जज़्बात, मत जाओ;

हार्दिक बधाई

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 22, 2012 at 6:21pm

प्रिय चातक जी,

हृदय की भावनाओं के बीच हो रहे अंतर्द्वंद का सजीव वर्णन किया है आपने| बधाई!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 22, 2012 at 5:33pm

अब तोड़ भी दो डर की ये दीवार, मत जाओ,
आने दो लबों तक भी अब ये बात, मत जाओ |

snehi chatak ji. sunda avahan se saji racna. badhai.

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