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रोज़ एक ज़ख्म नया दिल पे लगाया तूने
मेरी हंसती हुई आँखों को रुलाया तूने




खो चुका था मै गमो दर्द के सन्नाटों में
मेरी बेताब तमन्ना को जगाया तूने




मेरी उल्फत को न समझी है न समझेगी कभी
जब भी फुर्सत मिली इस दिल को दुखाया तूने




गैर की बज़्म सजाने के लिए तूने सनम
मुझसे हर रोज़ बहाना ही बनाया तूने




तेरा एक एक सितम हंस के "अलीम" ने सहा
उसके lab पर कभी शिकवा तो न पाया तूने

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Comment by Sanjay Kumar Singh on April 19, 2010 at 7:55am
Badhiya likh rahey hai Aleem jee, aapka pahaley ka post bhi padha achha hai, eesi tarah likhtey rahiyey,thanks,
Comment by Admin on April 19, 2010 at 7:47am
रोज़ एक ज़ख्म नया दिल पे लगाया तूने
मेरी हंसती हुई आँखों को रुलाया तूने

अलीम जी, नमस्कार, एक बार फिर शानदार रचना हम लोगो के सामने है, बहुत अच्छा शेर बन पडा है,बहुत बढ़िया, आप अच्छा लिख रहे है,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2010 at 10:19pm
मेरी उल्फत को न समझी है न समझेगी कभी
जब भी फुर्सत मिली इस दिल को दुखाया तूने
अलीम भाई ,पहले की तरह ये रचना भी बहुत ही शानदार है, बहुत खुबसूरत शेर आपने लिखा है,बहुत बहुत धन्यबाद,आगे भी इसी तरह लिखते रहिये,
Comment by aleem azmi on April 17, 2010 at 7:06pm
aap sabhi ke comments ka swagat hai...

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