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इश्क की कोमल भावनाओ से 

अछूती है मेरी कविताये 

इन्हें अभी एहसास नहीं 
किसी के प्रथम छुअन का 
तडप नहीं अभी इन्हें 
किसी के इंतजार की 
धडका नहीं शब्दों मे 
कोई नाम अभी 
शर्म से बोझिल हुई नहीं 
अभी काव्या मेरी 
किसी के होने से 
रचा नहीं कोई गीत इसने 
नहीं पता अभी इसे 
आलिंगन मे खो जाना क्या होता है 
बोझल सांसो के सुर ताल मे 
धडकनों का राग क्या होता है 
ये भी तो जाना नहीं, 
अभी इसने 
रगों मे एहसासो का 
बिजली सा कौंध जाना क्या होता है 
लाज का दामन थामे 
महफ़िल मे रुसवाई की हद तक 
किसी को ताके जाना क्या होता है 
इन बातो से भी तो 
अनभिज्ञ है मेरी कविता 
कि मंदिर की चौखट मे 
मांगी गयी दुआओं का 
हासिल क्या होता है 
अभी तो ये जान भी नहीं पाई है 
दर्द की उन बारीकियों को 
कि जिसमे चल के इश्क जवां होता है 
कि वाकिफ नहीं हुई है ये अभी 
बारिश के पानी से 
धुंधली पड़ी यादो का 
धुल जाना क्या होता है 
भीड़ और तन्हाई मे 
एक ही शख़्स को तलाशना 
और फिर निराशा के दर्द को 
सहलाना क्या होता है 
सूख चुके घावों को 
नित नयी उलाहनाओ से 
कुरेदना क्या होता है 
क्योंकि इश्क की कोमल भावनाओ से 
अभी अछूती है मेरी कवितायें..

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Comment

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Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 8:18am

आदरणीय प्रदीप जी, बहुत बहुत शुक्रिया आप का आप ही की कोशिशो का नतीजा है की मैंने फिर से वापसी की आप का आशीर्वाद ऐसे ही मिलता रहे :) 

Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 8:16am

रोहित शर्मा जी आप का बहुत बहुत आभार रचना की सराहना के लिए 

Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 8:15am

महिमा जी, ये मेरी खुशकिस्मती है जो आप ने रचना को पढ़ा, सराहा उम्मीद करती हूँ आगे भी ये सिलसिला कायम रहेगा  

Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 8:12am

वंदना जी, मुक्तकंठ से प्रसंशा के लिए आप का आभार 

Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 8:10am

संदीप जी, ये सब आप की मेहनत का ही नतीजा है आप के सानिध्य मे  बहुत कुछ सीखने को मिला. उम्मीद करती हूँ आप आगे भी इसी तरह से मेरी त्रुटियों मे सुधार करते रहेंगे एक मार्गदर्शक की तरह | आप का आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 19, 2012 at 5:25pm

स्नेही दिव्या जी, सादर 

पुनः आपका इस मंच पर स्वागत है. प्रतीक्षा थी . सुन्दर भाव के साथ प्रस्तुत रचना पर बधाई, वाहिद भाई की बात से मैं सहमत हूँ. 
Comment by MAHIMA SHREE on April 18, 2012 at 5:55pm
दिव्या जी नमस्कार ,
आपकी पहली कविता पढ़ रही हूँ .....बहुत अच्छा लगा ...आपके शब्दों में एक ईमानदारी , एक कसक का एहसास हुआ .बहुत कसाव है शब्दों में ..दिल से लिखी कोई
इबारत पढ़ रही हूँ एसा लगा.... ........बहुत -२ बधाई
Comment by Rohit Sharma on April 18, 2012 at 5:37pm

प्रथम प्रेम की कसक को बड़ी ही खूबसूरती के साथ सजाया गया है. धन्यवाद

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 18, 2012 at 3:21pm

बहुत ही सुंदर सहज शब्दों में गहन भावों की अभिव्यक्ति की है दिव्या जी! उस मंच से इस मंच के दरमियाँ पिछले कुछ महीनों में आपकी लेखनी में यह आश्चर्यजनक किन्तु सुखद परिवर्तन उल्लेखनीय है| अब समय आ गया है कि आप अतुकांत के साथ ही काव्य की अन्य विधाओं में भी अपनी 'काव्या' को दखल देने की इजाज़त दें| साधुवाद,


'काव्या'

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