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माँ से बढ़ कर कौन सखी है बाबाजी

इस दुनिया में कौन सुखी है बाबाजी
जिसको देखो, वही दु:खी है बाबाजी

तुम तो केवल चखना लेकर आ जाओ
बोतल हमने खोल रखी है बाबाजी

इसकी चन्द्रमुखी है, उसकी सूर्यमुखी
मेरी ही क्यों  ज्वालमुखी है बाबाजी

रिश्वत की मदिरा फिर उससे न छूटी
जिसने भी इक बार चखी है बाबाजी

बाप से बढ़ कर कौन सखा हो सकता है
माँ से बढ़ कर कौन सखी है बाबाजी

काम अपना जी जान से करने वालों ने
अपनी किस्मत आप लिखी है बाबाजी

पथ के काँटे  क्या कर लेंगे 'अलबेला'
मैंने चप्पल पहन रखी है बाबाजी 

JAI HIND !

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 17, 2012 at 1:25pm

इसकी चन्द्रमुखी है, उसकी सूर्यमुखी 
मेरी ही क्यों  ज्वालमुखी है बाबाजी 

आदरणीय अलबेला खत्री जी, सादर 

अपना भी हाल तेरे जैसा है ....? बधाई बाबा जी 

Comment by Nilansh on June 17, 2012 at 12:06pm

काम अपना जी जान से करने वालों ने 
अपनी किस्मत आप लिखी है बाबाजी 

पथ के काँटे  क्या कर लेंगे 'अलबेला' 
मैंने चप्पल पहन रखी है बाबाजी  

 

aadarniya albela ji

bahut sunder lagi aapki ye ghazal bhi

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 17, 2012 at 9:25am
बाबाजी आपने यहाँ तो उनको ज्वालामुखी कह दिया जरा बताइए उनको ये कविता दिखाई भी है या नहीँ?
कहीँ वो ज्वालामुखी आपके सिर पर ही न फूट जाये।
मुझे तो डर लग रहा है बड़े भैया आपके लिए...बच के रहना रे बाबा...बच के रहना रे
(मेरी कविता "मैँ वोटर हूँ..." जरुर पढिएगा)
Comment by Albela Khatri on June 16, 2012 at 10:34pm

धन्यवाद  योगेश जी.........
बहुत बहुत आभार

Comment by yogesh shivhare on June 16, 2012 at 10:03pm

बाप से बढ़ कर कौन सखा हो सकता है 
माँ से बढ़ कर कौन सखी है बाबाजी 

बहुत सुन्दर आदरणीय अलबेला जी  

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