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जब जब बेटी के ससुराल से फोन आता तो भार्गव जी अन्दर तक काँप उठते. दरअसल शादी के एकदम बाद दामाद ने नई कार देने की मांग रख दी थी. उसी वजह से कई बार बिटिया मायके आ भी चुकी थी. मामूली सी पेंशन पाने वाले भार्गव जी हर बार बिटिया को समझा बुझा कर वापिस भेज देते. लेकिन इस बार ससुराल का इतना दबाव था कि बिटिया समझाने पर भी नहीं मान रही थी और ज़िद पकड़ कर बैठ गई थी. भार्गव जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें.

आखिर एक दिन
अचानक दामाद के लिए नई कार आ ही गई, और बेटी अगले रोज़ अपने पति के साथ नई गाड़ी में ख़ुशी ख़ुशी विदा हो गई. भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.

"आज तो आपने इनकी मांग पूरी कर दी, लेकिन कल इन्होने कोई और महंगी चीज़ मांग ली तब आप क्या करोगे ?"
"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on June 25, 2012 at 7:24pm

हे भगवान्! किस सन्नाटे में छोड़ जाती है कथा.... और यह कथा भी कहाँ... सच्चाई ही तो है हमारे तथाकथित उन्नत और सभ्य समाज की... जहां आज तक भी दहेज़ की भट्टी का ताप बढ़ता ही जा रहा है... आदरणीय योगराज भईया इस झकझोर देने वाली उद्देश्यपूर्ण लघुकथा के लिए अनुज का सादर नमन स्वीकारें.... 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on June 25, 2012 at 3:58pm

स्वागत है आदरणीय योगराज जी ! जय ओ बी ओ !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 3:42pm

आदरणीय सौरभ भाई जी, दिल से धन्यवाद देता हूँ आपको. सिर्फ इसीलिए नहीं कि आपने लघुकथा की मुक्तकंठ से प्रशंसा की अपितु इसलिए भी कि आपने बहुत गहरे उतर कर इसके सभी पहलुयों को देखा समझा है. एक बाप को अपनी एक किडनी बेचनी पडी, और दूसरी बेचने में भी उसे गुरेज़ नहीं मुझे इसी बात ही को तो हाईलाईट करना था. क्या सही था क्या गलत था इस बात का फैसला मैंने भार्गव जी पर ही छोड़ दिया था. अब इस घटना को अगर कोई पलायनवादी सोच के दायरे में रखता है तो मैं समझूँगा कि मेरा प्रयास सफल रहा, क्योंकि यह कहानी है ही ऐसे व्यक्ति की. :))). 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 3:22pm

आदरणीय अम्बरीश भाई जी, मुझे आपकी हर बात से इत्तेफाक है. अगर भार्गव जी के स्थान पर मैं खुद होता तो शायद वही करता जैसा कि आप फरमा रहे हैं. मैंने सुश्री सविता सिंह से भी यही निवेदन किया था, और आपसे भी कर रहा हूँ कि इस लघुकथा से माध्यम से मुझे किसी समाधान की या कानून के डंडे के खौफ से बेटी को बसाने वाले पिता की तो बात ही नहीं करनी थी. मेरा उद्देश्य तो केवल एक साधारण बाप की संवेदनायों को उजागर करना मात्र था. आप जैसे विद्वान की दृष्टि इस रचना पर पड़ना ही मेरे लिए सब से बड़ा ईनाम है. सादर धन्यवाद.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 3:09pm

सुश्री सविता सिंह जी आपका स्वागत है, मैं आपका आशय बखूबी समझ पा रहा हूँ और उसका सम्मान भी करता हूँ. लेकिन मुझे यहाँ किसी समाधान की तो बात ही नहीं करनी थी, मेरा उद्देश्य तो केवल एक बाप की संवेदनायों को उजागर करना मात्र था. बहरहाल, आपने लघुकथा पढ़ी और अपनी बहुमूल्य राये दी, इसके लिए दिल से धन्यवाद.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 2:58pm

भाई कुमार गौरव अजीतेंदु जी, उत्साहवर्धन के लिए दिल से आभार व्यक्त करता हूँ. .


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 2:58pm

अग्रज प्रदीप सिंह कुशवाहा जी, लघुकथा पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 2:58pm

लघुकथा पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया राजेश कुमारी जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 2:55pm

भावेश राजपाल जी लघुकथा पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 2:54pm

लघुकथा पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया डॉ प्राची जी.

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