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जिस प्रकार के भवन की कल्पना बादशाह ने की थी यह भवन उससे भी कहीं अधिक सुन्दर बना था, जिसकी भव्यता देखकर बादशाह की आँखें चौंधिया सी गईं थीं. चहुँ ओर भवन निर्माण करने वाले शिल्पकार की मुक्तकंठ से प्रशंसा हो रही थी. जिसे सुनकर शिल्पकार भी फूला नहीं समा रहा था. लेकिन तभी अचानक बादशाह ने शिल्पकार के दोनों हाथ काट देने का आदेश दे दिया ताकि शिल्पकार पुन: ऐसी शानदार इमारत का निर्माण न कर सके. सुबह होते ही शिल्पकार के दोनों हाथ काट दिए गए. लेकिन अपने कटे हाथ देख शिल्पकार जोर जोर से ठहाके मार कर हँसने लगा, उसके ठहाके रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. यह हरकत देख कर वहां उपस्थित भीड़ मानो सकते में आ गई. एक व्यक्ति ने आगे बढ़कर पूछा:
"दोनों हाथ गंवाकर भी हँस रहे हो, पागल हो गए हो क्या ?"
"पागल मैं नहीं तुम्हारा बादशाह हो गया है ?
"वो कैसे ?"
"वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."

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Comment by Satyajit Roy on July 18, 2015 at 2:18pm
बहुत खूब सर जी, शत शत नमन आपको ....मृतप्राय हौसलो को भी यह ऊँची उडान दे दे .

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 7, 2012 at 2:15pm

दिल से धन्यवाद अग्रज प्रदीप सिंह कुशवाहा जी।

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 7, 2012 at 1:36pm

आदरणीय प्रभाकर जी, सादर अभिवादन 

सही कहा हाथ तो बहुतों के पास है. शिल्प आत्मा में बसती है. प्रेरणादायक कथा. 

बधाई. 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:49pm

स्वागत है  आदरणीय योगराज जी ,


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 4:13pm

आदरणीय अम्बरीश भाई जी, आपकी दृष्टि इस रचना पर पडी आपने पसंद किया और मुझ्र क्या चाहिए ? दिल से धन्यवाद आदरणीय.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:11pm

//"पागल मैं नहीं तुम्हारा बादशाह हो गया है ?
"वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."//

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी , इस शानदार लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 4:10pm

लघु कथा पसंद करने के लिए दिल से शुक्रिया राजेश कुमारी जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 4:10pm

भाई कुमार गौरव जी, दिल से आभार.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 4:09pm

दिल से आभार संदीप द्विवेदी भाई.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 4:09pm

डॉ प्राची सिंह जी, आपको लघुकथा पसंद आई, जान कर बेहद ख़ुशी हुई. सादर धन्यवाद.

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