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ओढ़ शून्य का झीना आँचल
बढ़ चलें अनायास ही...
शून्य में समेट लेने
प्रकृति का अनंत विस्तार
या फिर,
रचने शून्य से ही
सृजन के अनंत तार...  
जिसमे,
वक़्त का दरिया
हो लय,
रहे मात्र क्षण...
मीलों लम्बा फासला,  
मुकाम, 
डग भर,
तत्क्षण...
नील सागर निहित  
रत्न भंडारों का मोह
बाँध न पाए
चेतना के कदम....
 
डॉ. प्राची

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 6, 2012 at 12:56am

नीलवर्ण ब्रह्मांड के विस्तार का ही द्योतक है और बिम्बवत् उसे ऐसा ही कहते भी हैं. और कृष्ण वर्ण समयाभाव का या समयशून्यता का प्रतीक है.  नीलवर्ण और कृष्ण वर्ण के प्रतीक हमारे वाङ्गमय में स्पष्टतः उद्येश्यपरक हैं और दोनों वर्ण जिनसे जोड़े गये हैं वह चैतन्यस्वरूप का चरम है. सही या न-सही के मध्य चयन हेतु अविश्वसनीय विवेक है. उसके मार्ग पर दिशा स्वयं विवेक इंगित करता है. यही उस चेतना का के लिये पथ भी है.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 6, 2012 at 12:44am
इस रचना पर आपकी  शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार आ. सौरभ पाण्डेय जी.
अनंत का विस्तार अनंत है, आयाम भी अनंत हैं...और पाने के लिए रहस्मयी गूढ़ ज्ञान  भी अनन्त है..
काश हर अनुभूति को शब्दों में ढाल सकूँ, काश मुझे  शब्दों की वो कारीगरी भी मिल जाए, कि खूबसूरत और दिव्य सृष्टि और उसका एक एक रहस्य काव्य रूप पा सके...
इस काव्य में TIMELESSNESS  और SPACELESSNESS  को लिखना चाहती थी, नील सागर क्या है..... कैसा है, ये भी विस्तार नहीं दे पाई.. आगे प्रयत्न करूंगी.
पुनः आभार.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 6, 2012 at 12:32am

डा. प्राची,  चेतना अन्तःकरण के ग्राही सदृश चित्त में सकारात्मक वृत्तियों का कुल प्रयास है जिसे धार कर मनुष्य दिव्य पथ की ओर अग्रसरित होता है.  आपका मनन उस चेतना प्रक्रिया के प्रयास का बखान कर रहा है.  प्रयासरत रहें. कुछ और आयाम स्पष्ट होंगे.

सादर शुभकामनाएँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 12:03pm

आ. लक्ष्मण लाडिवाला जी, इन शब्दों के एहसास में क्षण-भर ठहरने के लिए आपका हार्दिक आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 12:01pm
आ. राजेश कुमारी जी, रेखा जोशी जी, अरुण शर्मा जी आपने इस रचना को देख, अपना कीमती वक़्त दिया, आपका ह्रदय से आभार.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 11:58am
आदरणीय योगी सारस्वत जी,
ये शब्द आपको सुन्दर लगे, इस हेतु आपका आभार

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 11:57am
आ. आशीष यादव जी, आपका आभार आपने इस रचना को सराहा.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 11:55am
आ. सुरेन्द्र शुक्ला जी, आपको यह रचना पसंद आयी आपका हार्दिक आभार

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 5, 2012 at 11:53am
आ. उमाशंकर मिश्रा जी, इस रचना की शून्य गहनता का आभास आपको सुन्दर लगा, इस हेतु आपका ह्रदय से आभार. 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2012 at 10:43am

तत्क्षण...

नील सागर निहित  
रत्न भंडारों का मोह
बाँध न पाए
चेतना के कदम....
 सुन्दर संदेशपरक शब्द ,सुन्दर भावपूर्ण रचना प्राची जी 

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