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चार कह-मुकरियां

मुख मण्डल उसका सतरंगा
सबका भेद करे वह नंगा
आज हि काम का कल बेकार
क्या वह टीवी ? नहीं अखबार

देह है भूरी मुख है लाल
पिछवाड़े से मुँह में डाल
बारिश में हो जाती चीड़ी
क्या वह कीड़ी ? नहिं भाई बीड़ी

रोज़ रात को मुँह में डालूं
चूस चास के पूरा खा लूँ
हाय वो मीठे रस की खान
क्या रसगुल्ला ? नहिं भई पान

गुड़ से ज़्यादा मीठी लागे
उसके पीछे मनवा भागे
नूरी नूरी रौशन रौशन
क्या वह सजनी ? नहीं पड़ोसन

-अलबेला खत्री

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Comment

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Comment by Albela Khatri on July 25, 2012 at 10:41pm

वाह रक्ताले साहेब.........वाह !

क्या बात है

___आभार

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 25, 2012 at 10:35pm

अलबेला जी
        सादर, सुन्दर मुकरियाँ.बधाई.

भीतर से फिर बाहर लाते,
रोज रोज फिर धार बढाते,
दिल पर घाव करती गंभीर,
क्या यह खुखरी? ना जी मुकरी.

Comment by Albela Khatri on July 24, 2012 at 3:16pm

भाई जी ऐयाँ न करो.....
सीली सीली  रुत म्ह  सिलसिलो बन्द न करो........
सावन बुरो मान जावैगो....हा हा हा

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 24, 2012 at 3:06pm

वाह भाई अलबेला जी --हा- हां- हां ३५ वर्ष पूर्व पढ़ी कविता के साथ लेखक की पडौसन वाला चित्र वाकई अति सुन्दर और प्रभावी चेहरे वाला था | पर अब उस लेखक का नाम याद नहीं, उस अंक में आदरणीय तब्बसुम जी की "भोरासा" नमक कविता छपी थी, उनके पास शायद अंक मिल जाए, आपकी तो पहुँच होगी ही |  ना ही धर्मयुग छाप रहा है, कलियुग जो आ गया है | हाँ यह सिलसिला जवान होता जा रहा है |  इस सिलसिले को ख़त्म करते हुए आपको पुनः हार्दिक बधाई |

Comment by Albela Khatri on July 24, 2012 at 2:59pm

धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद
thank you   thank you   thank you
आदरणीय  राजेश कुमारी जी
नम्बर नहीं दूंगा ....चाहो तो मिसेज को ले जाओ.......हा हा हा
___सादर

Comment by Albela Khatri on July 24, 2012 at 2:41pm

हा हा हा हा
आदरणीय  लक्ष्मण प्रसाद जी आपकी याददाश्त गज़ब की है ..३५ साल पुरानी  पड़ोसन की बात याद है तो  पड़ोसन भी तो याद ही होगी...हा हा हा

आपकी पड़ोसन को  हार्दिक बधाई.........
जय हो !
लगता है एकाध कह-मुकरी आप पर भी लिखनी पड़ेगी...हा हा हा
__सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 2:25pm
 हास्यरस में डूबी रसगुल्ले जैसी कह्मुकरियाँ और अंतिम तो !!!!अपनी मिसेज का नंबर देदो प्लीज अलबेला जी  !!
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 24, 2012 at 2:21pm
 
वाह वाह अलबेला जी, कह मुकरिया लिखने में सिद्धस्त हो रहे हो,
चलो हमें भी तो आनंद आ रहा है : पर आखरी कह मुकर जाना
मुझे ३५ वर्ष पूर्व की धर्मयुग साप्ताहिक में पढ़ी रचना की याद 
ताजा कर गयी -
"चलो सखी ईश दुआ का कुछ तो असर हुआ 
   मेरे न सही, मेरी पडौसन के तो बच्चा हुआ //
-इसे गंभीरता से न ले | हार्दिक बधाई 
Comment by Albela Khatri on July 24, 2012 at 2:11pm

धन्यवाद  भाईजी.......
सादर नमन

Comment by UMASHANKER MISHRA on July 24, 2012 at 1:24pm

अति सुन्दर प्रश्नावली कह्मुकरियाँ है इतनी सुन्दर आज के परिवेश में रोचक और रोमांटिक भी है

 

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