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कहानी ( जज़्बातों का जनाज़ा )

कहानी
 
जज़्बातों का जनाज़ा
6 अगस्त 2012 को मेरी प्यारी नानी का चवर्ख कुल्लू हिमाचल में होना निश्चित हुआ था I हम लोग देहली में रहते हैं , दफ्तर के कार्यों की वजह से मेरा वहां जा पाना बेहद कठिन सा हो रहा था इसलिए मैंने अपने बेटे से कहा की मेरी जगह तुम हो आओ......... यह सुनकर वह बोला ....आपकी नानी, रिश्ते में तो केवल मेरी परनानी लगी तो मेरा वहां जाना क्या ज़रूरी है ...? यह सुनकर मैं सन्न सा रह गया यह सोचकर कि उसका मेरी नानी से नज़दीक का रिश्ता नहीं दूर का रिश्ता है I और मेरे लिए मेरे नाना, नानी किसी देवी देवता,भगवान यहाँ तक की मेरे माँ बाप से ज्यादा अहमियत रखते थे क्योंकि मुझे तीन महीने की उम्र से पाला था I लेकिन मेरे बेटे नें कितनी आसानी से मेरे जजवातों को आग कि भठ्ठी में झोंक दिया.... 'जेनरेशन गैप' शायद इसी को कहते है कि हमें तो उनके जज़्बातों कि हर तरह से कद्र होनी चाहिए लेकिन उन्हें हमारी सोच हमारे जज़्बातों से कुछ लेना देना नहीं I जाने को मैं जा सकता था लेकिन मेरा बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता और बोह हुआ भी....... आखिर मुझे जाना ही पड़ा क्योंकि नानी तो मेरी ही थी सिर्फ मेरी किसी और कि नहीं I हालाँकि मुझपर किसी का कोई दबाव नहीं था लेकिन मेरा फ़र्ज़ मेरा प्यार झूठा नहीं था ..दिल से था उसका दर्द उसका एहसास मुझे केवल मुझे ही हो सकता है किसी और को नहीं ..... I
 
अपनी जगह शायद मेरा बेटा भी ठीक था उसने कहाँ मेरे जैसे घंटों घंटों बैठकर नाना नानी कि कहानियां सुनी है उनके साथ साथ घूमें फिरे है क्योंकि हमारे समय में न ही टेलीविज़न ही थे न इंटरनैट थे तो सिर्फ नाना नानी कि कहानियाँ य ज्यादा से ज्यादा रेडियो I
अपनें ही दिल का टुकड़ा
ऐसा दर्द दे गया
जीते जी मेरे जज़्बातों का
जनाज़ा निकल गया ..........
दीपक कुल्लुवी
03 -08 -2012 .

Views: 660

Comment

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on August 14, 2012 at 12:54pm

लक्ष्मण जी,रेखा जी,पांडे जी,अरुण जी  अपनी नानी के च्वर्ख के बाद कुल्लू से बापिस आ गया हूँ  और आप सबके जज्वात देखकर दिल को कुछ शांति,सकूं मिला......

धन्यवाद  

deepak......


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 5, 2012 at 6:35pm

अपने अपने मर्म को, अपना अपना काँध

दीपक जी, विचारणीय प्रश्न लिये सटीक कथा.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 5, 2012 at 3:47pm

श्री दीपक कुल्लुवी जी, बहुत सुंदर भावो की साथ प्रश्न छोड़ती कहानी के लिए बधाई |

जीते जी मेरे जज़्बातों काजनाज़ा निकल गया ....अब जमाने के साथ  मजबूरन सोच 
बदलनी होगी, बच्चों के द्रष्टिकोण से भी चिंतन कर निर्णय लेना होगा, जैसे इस कहानी 
लिया गया है |   
 
Comment by Rekha Joshi on August 5, 2012 at 12:28pm

अपनें ही दिल का टुकड़ा

ऐसा दर्द दे गया
जीते जी मेरे जज़्बातों का
जनाज़ा निकल गया ..,दीपक जी सही है यह अपने ही  दर्द देते है ,खूबसूरत कहानी ,बधाई 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 5, 2012 at 10:00am

लघुकथा की प्रविष्टि हेतु बधाई, वाह ! कई विचारणीय प्रश्न उभारती है यह लघुकथा.

कृपया ध्यान दे...

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