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इन्तहा है, हमारे सब्र की,
न जाने कब ये खत्म होगी,
जाने कब जागेंगे, और कसेंगे पीठ अपनी,
कब सचेत होंगे,
कब रोकेंगे हम विध्वंस को|
क्यों हम कहते हैं की मान जाओ,
जबकि हम जानते है,
वो कहने से नहीं मानेंगे,
वो नहीं समझेंगे मानवता को|
हम अपने सामर्थ्य से रोक सकते हैं उन्हें,
फिर भी सब्र किये बैठे हैं|
बहुत बड़ी इन्तहा है हमारे सब्र की,
अनंत तो नहीं, पर उसकी ही ओर|

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Comment by jitender kumaar on February 16, 2011 at 9:47pm
badhiya likha hai
Comment by Anupama on November 2, 2010 at 10:37pm
sundar abhivyakti!
Comment by Abhinav Arun on October 12, 2010 at 12:01pm
समर्थ विचार सार्थक प्रयास.सच है मानवता आज सब्र के चरम विन्दु पर. हम सबको परीक्षा पर खरा उतरना है.
Comment by Julie on October 11, 2010 at 11:38pm
सच कहा आपने... "बहुत बड़ी इन्तहा है हमारे सब्र की"... अच्छा लिखा है... बहुत...!!
Comment by Pooja Singh on October 11, 2010 at 9:26pm
नमस्कार ,
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है | इस सुंदर रचना पर आपको शुभकामनाये धन्यवाद |
Comment by DEEP ZIRVI on October 11, 2010 at 8:17pm
ह्म देव हैं वो देत्य
हम दया जानते हैं
Comment by Anupama on October 11, 2010 at 6:05pm
sundar abhivyakti!
Comment by आशीष यादव on October 10, 2010 at 10:12pm
bahut bahut dhanyawaad preetam bhaiya. hm aisahi likhat rahab.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 10, 2010 at 9:23pm
ashish bhai bas itna hi kahunga ki bahut achhi rachna hai...aisehi likhte rahe....
Comment by आशीष यादव on October 10, 2010 at 4:41pm
dep sahab, rana ji, aur baagi ji ko hausala aafjai ke liye dhanyawaad

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