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भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

हाय रे ये इश्क़ की बेताबियाँ
ले रही हैं ज़िन्दगी अंगड़ाइयां

क्या कहूँ इस से ज़ियादा आप को
मार डालेंगी मुझे तन्हाइयां

आजकल मातम है क्यूँ छाया हुआ
सुनते थे कल तक जहाँ शहनाइयाँ

दौर है ये ज़ोर की आजमाइशों का
भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां

इक जगह टिकती नहीं हैं ये कभी
मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां

'अलबेला' है मसखरा, शायर नहीं
ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां

-अलबेला खत्री

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Comment

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Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 11:58pm

सादर भाईजी........

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 11:54pm

स्वागत है आदरणीय अलबेला जी !

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 11:43pm

शुक्रिया रक्ताले जी......
बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 23, 2012 at 11:21pm

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां
बहुत सुन्दर वाह! वाह!

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 10:20am

dhnyavaad ambar ji.........

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 10:19am

शुक्रिया  उमाशंकर जी.........
बहुत बहुत धन्यवाद

सादर

Comment by UMASHANKER MISHRA on August 23, 2012 at 10:01am

वाह वाह है भाई प्रिय अलबेला

गज़ल की हर लाईन  मजेदार है

इक जगह टिकती नहीं हैं ये कभी
मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां

'अलबेला' है मसखरा, शायर नहीं
ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां ...निरुत्तर कर दिया मित्र आपकी भावनाओं को सलाम

गजल की हर लाईन बेहद कीमती है भावों  में सुन्दर नक्कासी है 

आपकी रचनाओं के साथ साथ आपकी प्रतिक्रिया ....अलग ही आनंद देती है

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 9:50am

स्वागत है आदरणीय !

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 9:24am

आपने बाँच कर  प्रोत्साहन दिया .......
आभारी हूँ भाई जी......
सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 9:18am

//चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख ले तू मेरी अब साइयां

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं हैं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां//

है निगाहों में अज़ब फितरत अजी

भा रहीं  अब  काम वाली बाइयां |

वाह आदरणीय अलबेला जी वाह .....अय हय हय हय............. क्या मस्त-मस्त गज़ल कही है ....क्या जंग है ........और लोटा !.....क्या कहने क्या कहने ......बाकी बचा शिल्प...... उस  पर कुछ नहीं कहूँगा क्योकि इस पर आप तो स्वयं ही कह रहे है ....सादर

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