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भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

हाय रे ये इश्क़ की बेताबियाँ
ले रही हैं ज़िन्दगी अंगड़ाइयां

क्या कहूँ इस से ज़ियादा आप को
मार डालेंगी मुझे तन्हाइयां

आजकल मातम है क्यूँ छाया हुआ
सुनते थे कल तक जहाँ शहनाइयाँ

दौर है ये ज़ोर की आजमाइशों का
भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां

इक जगह टिकती नहीं हैं ये कभी
मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां

'अलबेला' है मसखरा, शायर नहीं
ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां

-अलबेला खत्री

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on August 22, 2012 at 2:39am

सुन्दर भावाभिव्यक्ति


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 21, 2012 at 11:58pm

सादर भाईजी.

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 11:35pm

आदरणीय, मैं चाहता तो ये था कि इसे एडिट कर के  लगाऊं ....लेकिन फिर ख्याल आया कि  जो मुझे लग रहा है  वो सार्वजनिक क्यों न कर दूँ  ताकि  सभी मित्रों तक ये सन्देश पहुंचे कि   पोस्ट करने से पूर्व भली भांति परख लेनी  चाहिए रचना को.....अन्यथा  बाद में तो डंडा लेकर  महाप्रभु  आने  ही वाले हैं.....हा हा हा

आपके स्निग्ध स्पर्श ने  गदगद कर दिया  भाई जी.........

आपकी वीरू हो !
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 21, 2012 at 11:27pm

हा हा हा हा...........

क्या संशोधन हुआ है ! वाह !

सुना है, आपने भी अवश्य सुना होगा, आदरणीय, कि अपने उत्कर्ष के दिनों में जब सिर्फ़ नाम ही हर तरह से सक्षम हुआ करता था, नेहरूजी, छद्म नाम से अख़बारों में अपने ऊपर कड़ी से कड़ी विवेचना लिखते थे. उन लेखों में अपने कार्यों की खूब नुक़्ताचीनी किया करते थे. उनका तर्क़ था कि इससे वे अपनी ज़मीन नहीं भूल पाते. सब तरह से समरस रहते हैं.

आज आपको देखा खुद की ही लानतमलामत करते .. :-)))))))

जय हो.. . (वीरू ?) .. हा हा हा हा हा..........

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 11:18pm

आदरणीय  महाप्रभु..........मैंने आपके  आगमन  की आहट पा कर ख़ुद ही सारे सुबूत मिटा दिए....हा हा हा

डंडे से बच गया .....
वीरू हो !

__सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 21, 2012 at 11:13pm

लीजिये .. खुद ही कह दिया - ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां

अब क्या कहा जाय.  वर्ना कुछ पूछ बैठता.  आजमाइश ही सही, पर कैसी ?  :-)))

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 9:04pm

वाह वाह अलबेला जी.........बहुत खूब
क्या बात है
खूब कहा आपने

बस कहीं कहीं  चूक कर दी है........ठीक कर लेंगे तो बेहतर होगा


हाय रे ये इश्क़ की बेताबियाँ
ले रही हैं ज़िन्दगी अंगड़ाइयां

क्या कहूँ इस से ज़ियादा आप को ________________दोस्तो
मार डालेंगी मुझे तन्हाइयां  ____________________डस रही हैं नाग बन

आजकल मातम है क्यूँ छाया हुआ
सुनते थे कल तक जहाँ शहनाइयाँ _______________गूंजती थी कल

दौर है ये ज़ोर की आजमाइशों का _______________ज़ोर की आज़माइशों  का दौर है
भिड़ रही हैं परवतों से राइयां

चल पड़ा हूँ मैं निहत्था जंग में
लाज रख लेना तू मेरी साइयां _________________मेरे

इक जगह टिकती नहीं हैं ये कभी
मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ ______________हैं बड़ी

इतनी सुन्दर बीवियां दिखती नहीं
जितनी सुन्दर काम वाली बाइयां

'अलबेला' है मसखरा, शायर नहीं
ढूंढिए मत ग़ज़ल में गहराइयां

___धन्यवाद ...स्नेह बनाए रखिये

सादर

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 6:31pm

अरे अरे  भाई जी ..........
आपके इस स्नेह  के लिए मैं आकण्ठ  ऋणी हूँ  परन्तु  जब भी कोई  इस तरह मेरी पीठ ठोकता है शाबासी देने के लिए तो शर्म भी आती है

आपका बहुत बहुत धन्यवाद राजेश झा जी.........
सादर

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 6:26pm

सम्मान्य भाई  वाहिद जी..........
ज़माना ऊँचा  जा रहा है ...चाँद पर, मंगल पर.........ऐसे में  गहराई केवल  शायरी  में ही ढूंढना  क्या ज़रूरी है ?
कहना मत किसी  से, मैं ख़ुद जानता हूँ कि  इस ग़ज़ल में कोई दम नहीं....लेकिन मैं यह भी जानता हूँ  आप जैसे गहरे मित्रों का प्यार यों ही मिलता रहा तो...आ जायेगी ग़ज़ल में भी आ ही जायेगी...

आपकी सराहना  ..गदगद करती है
सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on August 21, 2012 at 6:13pm

एक बेहतरीन गजल के लिए मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं, आपको पढ़ना एक पुरस्‍कार से कम नहीं लगा

कृपया ध्यान दे...

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