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सूनी वीणा के फिर तार बजने लगे..............एक गीत.

---------------------------------------
लो चुपके से तुमने ये क्या कह दिया,
सूनी वीणा के फिर तार बजने लगे
कलियाँ खिल के हंसीं मन मचलने लगा, 
होंठों पे आज फिर गीत सजने लगे.
--------------------------------------
सरसराती हुयी जब हवा ये चली,
घर का आँगन भी मेरा चहकने लगा.
तेरे आने की आहट से हलचल मची,
कोना कोना भी अब तो महकने लगा.
प्यार के बोल सुनने की खातिर प्रिये,
अपने बोलों को पन्छी भी तजने लगे.
कलियाँ खिल के हंसीं मन मचलने लगा, 
होंठों पे आज फिर गीत सजने लगे.
--------------------------------------
सांवली हो सलोनी हो चंचल हो तुम,

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Comment

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Comment by UMASHANKER MISHRA on September 6, 2012 at 7:44pm

श्री दिनेश जी

रचना बहुत अच्छी है

शीघ्र  पूरा कीजिये

आदरणीय सौरभ जी सही कह रहे है लगता है कुछ छूट गया है

Comment by Yogi Saraswat on September 6, 2012 at 10:26am

सरसराती हुयी जब हवा ये चली,
घर का आँगन भी मेरा चहकने लगा.
तेरे आने की आहट से हलचल मची,
कोना कोना भी अब तो महकने लगा.
प्यार के बोल सुनने की खातिर प्रिये,
अपने बोलों को पन्छी भी तजने लगे.
कलियाँ खिल के हंसीं मन मचलने लगा, 
होंठों पे आज फिर गीत सजने लगे.

सुन्दर शब्द कहे हैं आपने , किन्तु आपने शायद ध्यान नहीं दिया , आपकी रचना अधूरी रह गयी है ! कृपया इसे पूरी करके हमें अनुग्रहीत करें !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2012 at 8:21pm

सुन्दर प्रयास भाई दिनेश जी, कृपया छूटा अंश भी पूरा कर लें , बधाई स्वीकार हो |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 5, 2012 at 6:33pm

भाई दिनेश वर्माजी, आपकी सुन्दर रचना कॉपी पेस्ट होने में आधी छूट गयी है. हमें तुरत लाभान्वित करें, भाईजी.

कृपया ध्यान दे...

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