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स्वर में अमृत घोलो जी
फिर अधरों को खोलो जी |


नहीं खर्च कुछ होने का
मीठा – मीठा बोलो जी |.


देने वाला कैसे दे ?
हाथ मलिन हैं धो लो जी |


मन से पश्चाताप करो
प्रायश्चित कर रो लो जी |


नाव सम्हल ना पाएगी
इतना भी मत डोलो जी |


मान सहित घर पहुँचा दे
साथ उसी के हो लो जी |


जीवन में क्या दिया-लिया
मन को जरा टटोलो जी |


अधिक जागरण ठीक नहीं
चादर तानो सो लो जी |


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

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Comment

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 4, 2012 at 7:31am

बहुत सुन्दर भाव आदरणीय अरुण कुमार निगम सर.........बधाई स्वीकारें........

Comment by वीनस केसरी on September 4, 2012 at 2:38am

नहीं खर्च कुछ होने का
मीठा – मीठा बोलो जी |.

सरल सहज अभिवयक्ति कैसा चमत्कृत कर देती है
है न ......

अधिक जागरण ठीक नहीं
चादर तानो सो लो जी |

यह तो मेरे लिए हैं  :)))))))))))))))

शुभ रात्रि

Comment by satish mapatpuri on September 4, 2012 at 1:36am

बहुत बढ़िया निगम साहेब ....... हल्के से  गंभीर बात कहना बहुत बड़ी बात होती है . बधाई स्वीकार करें .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 3, 2012 at 11:01pm

देने वाला कैसे दे ?
हाथ मलिन हैं धो लो जी |

बहुत सुन्दर .. .  बहुत-बहुत सुन्दर .. .

फिरभी, काश, थोड़ी मशक्कत और होती.    :-)))

सादर


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 3, 2012 at 10:41pm

बहुत खूब निगम साहिब, इस छोटी बहर पर बहुत ही कायदे से कहन को निभाते हुए बेहतरीन ग़ज़ल कही है , आनंद आ गया , मुबारकवाद कुबूल करें |

कृपया ध्यान दे...

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