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द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ ,,,,,,,,,

छोटी छोटी बातें बने आस्था के प्रश्न जब ,
बातें बड़ी बड़ी जाने क्यों बिसा र जाते है
अन्नदाता को तो है पिलाते दूध हम किन्तु ,
नौनिहाल देश की प्यासे मर जाते है
द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ
कृष्ण की चरित्र जब सत्ता की निमित्त हों
कैसे होंगे सीमित दु:शासनों के आचरण
कुंती पुत्र जब आत्मदाह को प्रवत्त हों
कैसे राष्ट्रगान राष्ट्र चिंतन करेगा कोई
पेट को भूख को अंगारे छलते हो मित्र
कैसे होगा देश का भविष्य खुशहाल भला
सड़कों पे जब वर्त्तमान पलते हो मित्र
नारे एकता अखंडता हो लगाते मित्र
बात इतनी सी न समझ पाए अब तक
भाईयों में कटुता कलुषता के बीज बो के
माँ की पीर हरने की बात करते हो मित्र

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 2, 2012 at 2:23pm

अजय जी, प्रयास बढ़िया है, भाव बढ़िया है, अन्नदाता का प्रयोग किस परिपेक्ष में हुआ है मैं नहीं समझ सका | इस प्रयास पर बधाई स्वीकार करें |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 1, 2012 at 11:02am
आपकी प्रस्तुत रचना के लिये धन्यवाद, अजय जी. आप भाव-संप्रेषण के लिहाज से अवश्य संवेदनशील हैं किन्तु कोई भाव-संप्रेषण व्याकरण के साधन को जबतक सबल और सक्षम न बनाये रचनाकार का प्रयास लम्बी दूरी तय नहीं कर सकता.
शुभेच्छाएँ.

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