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कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .

एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,

दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने के .
जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में ,
आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की .
लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित ,
देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की .
सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया ,
बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की .
आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया ,
सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की .
मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे ,
स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें आज़ादी की .
दृढ निश्चय से इन दोनों ने देश का सफल नेतृत्व किया 
ऐसी विभूतियाँ दी हैं हमको कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .
                                          शालिनी कौशिक 
                                                    [कौशल]

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2012 at 10:03pm

कविता के स्तर पर तो बहुत कुछ कहना-समझना होगा, किन्तु, दोनों महामानवों के प्रति निकले आपके उद्गार को मेरा हार्दिक अनुमोदन.

बधाई


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 3, 2012 at 8:55am

बापू और शास्त्री जी के जन्म दिवस पर आपकी यह रचना एक श्रद्धांजलि है | अच्छी रचना हेतु बधाई शालिनी जी |

Comment by shalini kaushik on October 2, 2012 at 9:23pm

thanks rajesh ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2012 at 8:48pm

बढ़िया प्रस्तुति बधाई शालिनी जी 

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