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नवगीत: नफरत पाते रहे प्यार कर ----- संजीव 'सलिल'

नवगीत:

नफरत पाते रहे प्यार कर

संजीव 'सलिल'
*
हर मर्यादा तार-तार कर
जीती बाजी हार-हार कर.
सबक न कुछ भी सीखे हमने-
नफरत पाते रहे प्यार कर.....
*
मूल्य सनातन सच कहते
पर कोई न माने.
जान रहे सच लेकिन
बनते हैं अनजाने.
अपने ही अपनापन तज
क्यों हैं बेगाने?
मनमानी करने की जिद
क्यों मन में ठाने?
छुरा पीठ में मार-मार कर
रोता निज खुशियाँ उधार कर......
*
सेनायें लड़वा-मरवा
क्या चाहे पाना?
काश्मीर का झूठ-
बेसुरा गाता गाना.
है अवाम भूखी दे पाता
उसे न खाना.
तोड़ रहा भाई का घर
भाई दीवाना.
मिले आचरण निज सुधार कर-
गले लगें हम जग बिसार कर.....
*******************

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 26, 2010 at 11:36am
सबक न कुछ भी सीखे हमने,
नफरत पाते रहे प्यार कर,

आचार्य जी सिर्फ यह दो लाइन पूरी नवगीत को व्यक्त करने मे सक्षम है, बहुत ही सुंदर कृति, बधाई स्वीकार कीजिये |
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 25, 2010 at 11:41am
हर मर्यादा तार-तार कर
जीती बजी हार-हार कर.
सबक न कुछ भी सीखे हमने-
नफरत पाते रहे प्यार कर.....

बहुत ही अच्छा गीत प्रस्तुत किया है आपने आचार्य जी....बधाई ही आचार्य जी.
Comment by आशीष यादव on October 23, 2010 at 3:12pm
ek badiya geet prastut ki hai acharya ji aapne.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 22, 2010 at 6:55pm
आचार्य जी सादर प्रणाम
इन्सान के खोखलेपन का दर्शन करता एक सटीक नवगीत|

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