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आग लगाकर इक पुतले को परचम लहराएगी जनता

आग लगाकर इक पुतले को परचम लहराएगी जनता
असली रावण मंच विराजित जय कारे गायेंगी जनता
दस शीशों से पहचाना था जिस रावण को पुरसोत्तम ने
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?

कुम्भकरण भर पेट पड़े हैं इन्द्रप्रस्थ के दरबारों में
भांति भांति के इन्द्रजीत हैं गली गली में चौबारों में
चोरों की चौपाल जहाँ हो वहां भला क्या होगी समता
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?

दूषित मन की अभिलाषाएं अखबारों की ताजा ख़बरें
चौराहे पर स्वेत वस्त्र में लिपटे हैं लावारिश सपने
लोकतंत्र में गांधी जी की तस्वीरों की मन में ममता (मुद्रा ..पैसा )
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?

आदर्शों की पगडण्डी पर चलना केवल सपने जैसा
....सत्य शब्द के नयें अर्थ हैं झूठे वादे करने जैसा
कर्म कुकर्म न हो यदि तेरा जीने का फिर हक़ ना बनता
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?

अपने ही भारत में रहना परदेशी का स्वागत करना
कितना ही खूंखार भले हो स्वागत उसका मन से करना
आरक्षण के दशहेरे बिन फिर से रावण नहीं है बनता
कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?....मनोज

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Comment

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Comment by Vinita Shukla on October 26, 2012 at 11:37am

वर्तमान परिस्थितियों पर प्रश्न्चिन्ह खड़े करती हुई सुन्दर रचना. बधाई.

Comment by UMASHANKER MISHRA on October 26, 2012 at 12:19am

मनोज जी आज की  दशा पर बहुत दमदार अभिव्यक्ति है 

आपने बहुत कुछ कह दिया जो भी कहा सच ही कहा है 

ह्रदय से बधाई स्वीकारें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 25, 2012 at 10:29am

मनोज जी बहुत बढ़िया व्यंग्यात्मक प्रवाह युक्त सामयिक कविता बहुत बहुत बधाई आपको कहीं कही टंकण त्रुटी है दूर कर लीजिये 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 24, 2012 at 11:51am

//कल युग में बस एक शीश से कैसे पहचानेगी जनता ?//

वाह मनोज जी वाह, रावण को प्रतिक बनाकर बहुत कुछ कह दिया है, आज के परिवेश में बहुत ही सटीक कटाक्ष, इस खुबसूरत अभिव्यक्ति पर बधाई और विजयादशमी के पवन पर्व पर ढ़ेर सारी शुभकामनायें स्वीकार हो |

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