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आदरणीय सौरभ जी जी, वर्ष 2000 (शायद) में डॉ हरिवंश राय बच्चन जी के स्वर्गवास पर समाचार पत्र से, और श्री अमिताभ बच्चन द्वार दूरदर्शन पर सुनकर कुछ दिन कुछ पंक्तिया मै गुनगुनाता रहता था । अभिहाल ही एक माह पहले रात्रि को नींद न आने पर यह रचना लिखी पर मेरी प्रकृति के विपरीत समाज को लगेगी, यह सोचकर पोस्ट नहीं कर पारहां था । आपका दिल से हार्दिक आभार आदरणीय।
आदरणीय लक्ष्मणजी, शृंगार की मनोहारी छटा व्याप गयी है. दो कारण प्रतीत होते हैं.
एक, लगता है आपने अभी-अभी बच्चन की ’मधुशाला’ पढ़ी है. दो, .... जय होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ... :-))))
AABHAAR
आदरणीय अग्रज |
गजब --
सादर
भाई साहब का प्रिये, नगर गुलाबी श्रेष्ठ |
चढ़ा गुलाबी रंग है, सृंगारिकता ठेठ ||
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