For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पेट के कहने में फिर हम आ गए

पेट के कहने में फिर हम आ गए 
पीठ पे ढ़ोने शहर , हम आ गए 
माँ ,बहन , भाई , पिता रिश्तें सभी 
छोड़ कर गाँव का घर हम आ गए -----------------
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऑफिस का रिक्शा पापा का और मदिर वो घंटा - घंटी 
अम्मा की हर बात रटी थी हमको बरसों पंक्ति पंक्ति 
हंसी ठिठोली , गिल्ली - डंडा बाबा जी की घंती - मंती 
मास्टर जी का पाठ याद

 था , और दीदी की डंडा संटी 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तोड़ फोड़ कर बचपनके , सारे खिलौनें , रेत भर हांथों को ले कर 
छोड़ कर गाँव का घर , पीठ पे ढ़ोने शहर , हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
आँगन की वो धुप , छाँव , गर्मी , सर्दी , बारिश हैं याद 
खट्टा,मीठा , कडुआ ,खारा जिह्वा पर सारे हैं स्वाद 
धुप सेंकती माँ का चेहरा , छाँव ढूँतें बाबा दायी 
गर्मी का पंखा सिन्नी का और सर्दी की एक रजाई 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कतली, खीर, कसार, रवे का हलुआ, छोड़ कर आधा ही सफ़र 
पीठ पे ढ़ोने शहर , छोड़ कर गाँव का घर, हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
हमको मिलता था उपहार जब आती गर्मी की छुट्टी 
सुबह सुबह उठने से ज्यादा इस्कूली बस्ते से मुक्ति 
बस इक होती थी बिनबोली , पापा से अपनी मनुहार
बरस बाद हो सुलभ हमें भी अम्मा की अम्मा का प्यार 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पापड़,दवा,अचार के सौ सौ नुस्खे , अब कहा नानी , कहा नानी का घर 
पीठ पे ढ़ोने शहर , छोड़ कर गाँव का घर, हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
माँ ,बहन , भाई , पिता रिश्तें सभी छोड़ कर गाँव का घर हम आ गए -----------------पेट के कहने में fir हम आ गए 
पीठ पे ढ़ोने शहर , हम आ गए 
माँ ,बहन , भाई , पिता रिश्तें सभी 
छोड़ कर गाँव का घर हम आ गए -----------------
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऑफिस का रिक्शा पापा का और मदिर वो घंटा - घंटी 
अम्मा की हर बात रटी थी हमको बरसों पंक्ति पंक्ति 
हंसी ठिठोली , गिल्ली - डंडा बाबा जी की घंती - मंती 
मास्टर जी का पाठ याद
 था , और दीदी की डंडा संटी 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तोड़ फोड़ कर बचपनके , सारे खिलौनें , रेत भर हांथों को ले कर 
छोड़ कर गाँव का घर , पीठ पे ढ़ोने शहर , हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
आँगन की वो धुप , छाँव , गर्मी , सर्दी , बारिश हैं याद 
खट्टा,मीठा , कडुआ ,खारा जिह्वा पर सारे हैं स्वाद 
धुप सेंकती माँ का चेहरा , छाँव ढूँतें बाबा दायी 
गर्मी का पंखा सिन्नी का और सर्दी की एक रजाई 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कतली, खीर, कसार, रवे का हलुआ, छोड़ कर आधा ही सफ़र 
पीठ पे ढ़ोने शहर , छोड़ कर गाँव का घर, हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
हमको मिलता था उपहार जब आती गर्मी की छुट्टी 
सुबह सुबह उठने से ज्यादा इस्कूली बस्ते से मुक्ति 
बस इक होती थी बिनबोली , पापा से अपनी मनुहार
बरस बाद हो सुलभ हमें भी अम्मा की अम्मा का प्यार 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पापड़,दवा,अचार के सौ सौ नुस्खे , अब कहा नानी , कहा नानी का घर 
पीठ पे ढ़ोने शहर , छोड़ कर गाँव का घर, हम आ गए 
,.,.,.,.,.,..,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.
माँ ,बहन , भाई , पिता रिश्तें सभी छोड़ कर गाँव का घर हम आ गए -----------------

Views: 311

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वीनस केसरी on December 6, 2012 at 1:08am

सुन्दर भाव

बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद  परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण…"
10 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाईजी, चौपाई छंद में आपने प्रदत्त चित्र को उपयुक्त शब्द दिये हैं. सुगढ़ रचना के…"
20 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। तुकांतता के दोष में…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद आभार आपका लक्ष्मण भाईजी"
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद लक्ष्मण भाई "
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी आदरणीय अशोक भाईजी  चौपाई में चित्र का  सम्पूर्ण  चित्रण हुआ है।…"
1 hour ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।....वाह ! वाह ! प्रदत्त चित्र की आत्मा का भाव आपने…"
3 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण भाईजी चित्र को विस्तार से छंद बद्ध करने के लिए हार्दिक बधाई । कुछ त्रुटियाँ मेरी नजर…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्र को साकार करती बहुत सुंदर चौपाइयाँ हुई हैं। बहुत बहुत…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, यह संशोधित छंद और भी उत्तम हुए हैं। यह पूर्ण रूप से चित्र को संतुलित कर रहे हैं।…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्र पर सुंदर छंद हुए हैं । हार्दिक बधाई।"
7 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service