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इन दिनों 

जैसे ही सूरज 
झील में पनाह लेता है 
पंछियों के झुण्ड 
और भेड़ों की रेवड़ 
अपने अपने घर 
कुछ जल्दी लौटती है 
........
सांवली सी 
कोमल 
स्निग्ध शाम  
पहाड़ों की सीढ़ियों पर 
पैर जमाये 
धीरे से  उतरती है 
कितने लम्हे 
कोहरे की चादर लपेटे  
सामने ठहरते हैं 
तुम्हारी एक  पुकार के 
इंतज़ार में 
कितनी सदियाँ 
आँखों में बनती संवरती  हैं 
....

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Comment

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Comment by rajluxmi sharma on July 17, 2013 at 7:40pm

आपसब का आभार ...:)

Comment by rajluxmi sharma on January 10, 2013 at 6:48pm

मै तो कतरा थी 

...
सागर बनाया आपने ....
आप सब का आभार ..... बागी जी ,प्राची जी ,कुशवाहा जी अरुण शर्मा जी, और नादिर खान जी ...:)
Comment by नादिर ख़ान on January 10, 2013 at 4:57pm

क्या कहने, उम्दा रचना ....

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 10, 2013 at 4:19pm
कितने लम्हे 
कोहरे की चादर लपेटे  
सामने ठहरते हैं 
तुम्हारी एक  पुकार के 
इंतज़ार में 
कितनी सदियाँ 
आँखों में बनती संवरती  हैं वाह सुन्दर पंक्तियाँ खूबसूरत रचना हार्दिक बधाई.
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 4:18pm

bahut sundar bhaav 

badhai 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 10, 2013 at 4:14pm

मन के भावों की सुन्दर शब्द व सुन्दर बिम्बों से प्रस्तुति, बहुत सुन्दर रचना 

हार्दिक बधाई राजलक्ष्मी शर्मा जी 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 10, 2013 at 3:05pm

वाह वाह, बहुत ही सुन्दर बिम्बों को समाहित किया है अपनी इस कविता में, अच्छी लगी यह रचना, बधाई इस कृति पर |

Comment by rajluxmi sharma on January 9, 2013 at 8:16pm

शुक्रिया ...विजय निकोरे जी एवं संदीप कुमार पटेल जी।।

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 9, 2013 at 4:11pm
तुम्हारी एक  पुकार के 
इंतज़ार में 
कितनी सदियाँ 
आँखों में बनती संवरती  हैं waah kya baat hai badhai ho
Comment by vijay nikore on January 9, 2013 at 3:35pm

राजलक्ष्मी जी,

तुम्हारी एक  पुकार के
इंतज़ार में
कितनी सदियाँ
आँखों में बनती संवरती  हैं
बहुत ही मार्मिक भाव है।
बधाई।
विजय निकोर

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