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दोस्तों, भारत पाक सीमा पर जी हो रहा है, वो बड़ा ही दुखद है, हमारे जवानों के सर को कलम कर दिया गया,
इस बात से हर हिंदुस्तानी के दिल को चोट लगी है, एक छोटी सी रचना पेश कर रहा हूँ शीर्षक है "पडोसी"
"पडोसी"   ( मौलिक व् अप्रकाशित )
मेरे शहर की गावों से अब नहीं बनती
बिलावजह जाने क्यूँ भोहें हैं तनती
गली-गली में अमन की बात करते हैं,
फिर अचानक तलवारें हवाओं में चमकी
मुल्कों, मजहबों, जातियों में बटे दिल,
दो सगे भाइयों में भी अब नहीं बनती
फिर लहू बहेगा ज़मीं पे बेगुनाहों का,
सरहद पार से आ रही है रोज़ धमकी
सर कलम करके क्या होगा हासिल,
न डर न ख़ुदा का खौफ़ किये जाओ मन की
पडोसी नज़रें तरेरता बेलगाम हुआ,
पल में तोला, पल मैं माशा, बड़ा है सनकी
हुक्मरां, ख़ामोश, तमाशबीं बन बैठे,
अवाम बेज़ार ख़ुदा लाज रखे वतन की
जानवरों से भी बदतर बशर का चलन,
"रत्ती" फ़िक्र हयात की और तन की
सुरिन्दर रत्ती
मुंबई

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Comment by Dr.Prachi Singh on January 18, 2013 at 3:21pm

संवेदना की सहज अभिव्यक्ति आ. सुरिंदर रत्ती जी 

Comment by SURINDER RATTI on January 18, 2013 at 12:01pm
राजेश आपका भी आभार - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई
Comment by SURINDER RATTI on January 18, 2013 at 12:00pm

उपसबा जी, धन्यवाद - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई

Comment by SURINDER RATTI on January 18, 2013 at 11:58am

शन्नो जी, रचना सराहने हेतु आभार - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई

Comment by Shanno Aggarwal on January 17, 2013 at 8:24pm

सुरेन्द्र जी, बिलकुल सही कहा...संवेदन शील रचना...

''जानवरों से भी बदतर बशर का चलन''

Comment by upasna siag on January 17, 2013 at 5:04pm
हुक्मरां, ख़ामोश, तमाशबीं बन बैठे,
अवाम बेज़ार ख़ुदा लाज रखे वतन की............निशब्द हूँ .......मार्मिक और सवाल छोडती रचना 
Comment by राजेश 'मृदु' on January 17, 2013 at 2:41pm

पहली बार आपकी रचना पढ़ी । आपकी संवेदना से हमारी भी संवेदना मिला लीजिए । बधाई इस प्रस्‍तुति पर

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