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ग़ज़ल : सन्नाटे के भूत मेरे घर आने लगते हैं

सन्नाटे के भूत मेरे घर आने लगते हैं

छोड़ मुझे वो जब जब मैके जाने लगते हैं

 

उनके गुस्सा होते ही घर के सारे बर्तन

मुझको ही दोषी कहकर चिल्लाने लगते हैं

 

उनको देख रसोई के सब डिब्बे जादू से

अंदर की सारी बातें बतलाने लगते हैं

 

ये किस भाषा में चौका, बेलन, चूल्हा, कूकर

उनको छूते ही उनसे बतियाने लगते हैं

 

जिसकी खातिर खुद को मिटा चुकीं हैं, वो ‘सज्जन’

प्रेम रहित जीवन कहकर पछताने लगते हैं

-----------------------------------------------

(यह ग़ज़ल स्वरचित एवं अप्रकाशित है)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:48pm

शुक्रिया आशीष नैथानी 'सलिल' साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:46pm

इस अपार स्नेह के लिए बहुत बहुत धन्यवाद  बागी जी और विशेष दाद के लिए आपका विशेष शुक्रगुजार हूँ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:44pm

बहुत बहुत शुक्रिया rajesh kumari जी, स्नेह यूँ ही बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:40pm

बहुत बहुत धन्यवाद Dr.Prachi Singh जी, स्नेह अनवरत बनाए रखें

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:38pm

धन्यवाद विजय मिश्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2013 at 3:37pm

Dr.Ajay Khare जी, शुक्रिया जनाब

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 14, 2013 at 1:56pm
आदरणीय धर्मेन्द्र सर जी सादर प्रणाम 
क्या बेहतरीन अशआर  निकले हैं सर जी
इस लाजवाब ग़ज़ल हेतु ढेरों बधाई स्वीकार कीजिये  
Comment by Arun Sri on February 14, 2013 at 1:15pm

वाह ! कौन कहता है गज़ल सिर्फ जुल्फों-रुखसार और अरिजो-गुल की बातें करती है ! रसोईघर की बाते भी होती है ! वाह ! इस एक वाह को वाहवाही का अनवरत सिलसिला समझा जाए ! :-)

Comment by vijay nikore on February 14, 2013 at 9:19am

बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर!

बधाई।

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 14, 2013 at 5:06am

भाई धर्मेंद्रजी, घरेलू सन्नाटे के पसरेपन पर क्या कलम चली है ! साहब, आपकी सोच-प्रक्रिया में ही गोया इस्पेशल बैक्टिरिया घर कर गये हैं ! वर्ना ऐसे कोई समझ भी लेता है क्या ? --

उनके गुस्सा होते ही घर के सारे बर्तन
मुझको ही दोषी कहकर चिल्लाने लगते हैं .... ... .....   क्या नहीं देख लिया !!! ...

मैं इस ग़ज़ल पर दिल से बधाई दे रहा हूँ.

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