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खयाल जिंदा रहे तेरा..
जिंदगी के पिघलने तक..
और मैं रहूँ आगोश में तेरे..
बन महकती साँसें तेरी..

तुझे पिघलाते हुए अब..
पिघल जाना मुकद्दर है..
बह गया देखो तरल बनकर..
अनजान अनदेखे नये..
ख्वाहिशों के सफर पर..

तुझे छोड़कर तुझे ढूँढने..
खामोश पथ का राही बन..
बेसाख्ता ही दूर तक..
निकल आया हूँ मैं..

सुनसान वीराने में तुझे पाना..
तेरी वीणा के तारों को..
नए सिरे से झंकृत..
कर पाना मुमकिन नहीं..
तुझसे दूर, तेरे पास भी..
रह पाना मुमकिन नहीं..

तुझे पिघलाते हुए अब..
पिघल जाना मुकद्दर है..
बह गया देखो तरल बनकर..
खयाल जिंदा रहे तेरा..
जिंदगी के पिघलने तक..
और मैं रहूँ आगोश में तेरे..
बन महकती साँसें तेरी..


जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 06 नवंबर 2010 )

.

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Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 8, 2010 at 5:02pm
नवीन भईया ,,,
जो आप ठीक समझो कहो ......
भईया हम तो आपकी गाय हैं , हाँक लो जैसे मन करे......
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 8, 2010 at 4:25pm
लीक तो पता नहीं बागी भाई ,,,
पर हाँ कुछ कलम घिसने जैसी गुस्ताखी अवश्य हो जाती है मुझसे ...
ऊपर से आप जैसे हवा देने वाले मित्र भी मिल जाएँ तो समझो रोज एक नयी कलम खरीदनी पड़ेगी... हाहाहा...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 8, 2010 at 8:57am
लीक से हटकर कुछ लिखने का नाम ही शायद जोगिंदर है, इस बार भी एक शानदार प्रस्तुति | आपकी रचनाओं और टिप्पणियों का इंतजार "महा इवेंट" मे भी है |

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