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राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी

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राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी 
मजहब के मंदिर मस्जिद पर बलि का बकरा आम आदमी ||
राजतंत्र के भ्रष्ट कुएं में पनपे ये आतंकी विषधर 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||

क्या है हिन्दू, क्या है मुस्लिम क्या हैं सिक्ख इसाई प्यारे 
लहू एक हैं - एक जिगर है एक धरा पर बसते सारे 
एक सूर्य से रौशन यह जग , एक चाँद की मस्त चांदनी 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||

चाँद देखकर ईद मनाओ और पूज कर पूरनमासी 
गीता पढ़कर धर्म जगाओ पढ़ कुरान आयत पुरवा सी 
गुरुवाणी में सत्य दरश है ,त्याग बाइबल की अनुगामी 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||

खून बहाकर क्या पाओगे , ख़ाक कोई जन्नत जाओगे 
मरने से तुम भी डरते हो तुम क्या मौत बदल पाओगे 
खुदा देख पछताता होगा किसने ये बन्दूक थमाई 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||

याद रहे मेरे भारत में भगत सिंह भी हैं ,गाँधी भी 
शांति मार्ग के बुद्ध देव भी , राम कृष्ण जैसी आंधी भी 
यही इशारा काफी होगा समझदार तुम भी हो काफी 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||.............. manoj

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Comment by रविकर on February 23, 2013 at 4:24pm

बहुत बढ़िया है आदरणीय -

शुभकामनायें |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 23, 2013 at 3:33pm

बहुत सुन्दर वास्तविकता का दर्प दिखाती सामयिक रचना.

राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी 
मजहब के मंदिर मस्जिद पर बलि का बकरा आम आदमी ||
राजतंत्र के भ्रष्ट कुएं में पनपे ये आतंकी विषधर 
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||.....ज़बरदस्त कथ्य है..

बहुत बधाई आ. मनोज जी,

आपकी रचनाओं को पढ़ना सदैव सुखकर रहा है, भाव कथ्य चिंतन प्रवाह सत्य के धरातल पर अपने साथ बहा ले जाता है...सादर.

Comment by Manoj Nautiyal on February 23, 2013 at 10:42am

धन्यवाद , गणेश जी "बागी " जी बहुत्सुन्दर पंक्तियाँ हैं आपकी |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 23, 2013 at 9:52am

बहुत ही सामयिक रचना, हाल के घटनाओं से उपजेभावों को बहुत ही संजीदगी से पिरोया है मनोज जी , बधाई स्वीकार करें ।

अपनी ही एक भोजपुरी घनाक्षरी की दो पक्तियां याद आ रही है कि ...

होला सियासत खाली, धरम के नाम पर,
मसजिद में राम के, देखेला आम आदमी ||

कृपया ध्यान दे...

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