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चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर
अनजानी डगर है मंजिल अनजान
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
...........................................
आँधियों के थपेड़ो ने डराया मुझको
गरजते बादलो ने दहलाया दिल को
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
..........................................
भटक रहा कब से पथरीली राहों पर
पथिक हूँ अनजान कंटीली राहों का
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
............................................
आसन नही चलना हो कर जख्मी
गिरता पड़ता ठोकरें खाता कितनी
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
.........................................
चलता रहूँगा साथ देंगे पाँव जब तक
कहाँ जा रहा हूँ नही जानता अब तक
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
............................................
कभी तो मिलेगी यूँ चलते हुए मंजिल
कहीं तो ले जाएगी ये राह जिंदगी की
यही सोच मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
...........................................

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Views: 486

Comment

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Comment by Rekha Joshi on February 26, 2013 at 9:17pm

आ ब्रजेश जी ,आ श्री राम जी ,आ डा प्राची जी ,आ बागी जी ,आ लक्षमण जी ,आ दिनेश जी ,उत्साह वर्धन हेतु आप सब का हार्दिक आभार ,धन्यवाद 

Comment by Dinesh Kumar Namdev on February 24, 2013 at 5:11pm

Every foolish never has an aim.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 24, 2013 at 4:32pm

अच्छी रचना की प्रस्तुति हुई है आदरणीया, बधाई हो ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 24, 2013 at 3:40pm
कभी तो मिलेगी यह मंजिल, इसी आशा से बढ़ते रहने का आशावादी द्रष्टिकोण बहुत भाया 
हार्दिक बधाई रेखा जोशी जी 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 24, 2013 at 1:28pm

मंजिल तक पहुँचने का हौसला देती रचना के लिए बधाई आ. रेखा जी 

Comment by श्रीराम on February 24, 2013 at 7:52am

कहीं तो ले जाएगी ये राह जिंदगी की .......सुन्दर 

Comment by बृजेश नीरज on February 23, 2013 at 7:48pm

सुन्दर रचना!

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