तेज धूप में छांव की आस है
रेत के बीच बढ़ रही प्यास है
हाथ में तीर और तलवार है
वो जो मेरे दिल के पास है
कथन के अर्थ को समझ लेना
अपनों की अपनों से खटास है
बाल धूप में सफेद होने लगे
तेरी उम्र में फिर क्या खास है
वो कल जिंदा था आज लाश है
विरोध उनको आता नहीं रास है
- बृजेश नीरज
Comment
वीनस जी आपका आभार। मेरे साथ एक समस्या है मैं गा नहीं पाता इसलिए मेरी रचनाओं में लय की कमी रहती ही है।
बहुत खूब
हार्दिक बधाई
मुझे लयात्मकता में कुछ कमी दिख रही है ...
शुभकामनाएं
महोदया,
मैं हिन्दी व्याकरण में काफी कमजोर रहा हूं। लिखना सीख ही रहा हूं। अर्ध विराम, विराम जहां बहुत आवश्यक होता है प्रयोग करने का प्रयास करता हूं अन्यथा नहीं ही करता। यह अभी तक मेरे लेखन का ढंग रहा है। आपकी आपत्ति के बाद इसमें सुधार करने का प्रयास करूंगा लेकिन समस्या यह है कि एक कमजोर विद्यार्थी कितना और किन किन क्षेत्रों में सुधार कर सकेगा यह विचारणीय है।
सादर!
Aarti Sharma ji आपका आभार!
अपनों की अपनों से खटास है
बहुत खूब सर..बधाई
आदरणीय गणेश जी
कृपया संशोधन पर नजर डालें। बात कुछ बनती दिख रही है अथवा नहीं।
सादर!
विन्ध्येश्वरी जी
आपका बहुत आभार! अभी तो यह तनाव है कि बागी जी के आपत्ति के बाद इस 'लाश' का क्या करूं।
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