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यह नारा कमजोर था, नारा नारीखोर-

मौलिक/अप्रकाशित

नारा की नाराजगी, जगी आज की भोर ।

यह नारा कमजोर था, नारा नारीखोर ।

नारा नारीखोर, लगे सड़कों पर नारे ।

नर नारी इक साथ, कई दिन तक हुंकारे ।

करता पश्चाताप, मुख्य आरोपी मारा ।

सुधरो नारेबाज, पाप से करो किनारा ॥

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 12, 2013 at 4:52pm

सुन्दर  ! बधाई भाई श्री रविकर जी |

अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत

पाप तो धुले ही नहीं, पापी सब अब खेत |

  

Comment by रविकर on March 12, 2013 at 4:22pm

आभार आदरणीय-

Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 11:18am

आदरणीय रविकर सर अपने छंद के माध्यम से सटीक व्यंग किया है ....
हमरे देश में यही तो विडम्बना है ...............प्रणाम सहित हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 11, 2013 at 11:50pm

महात्मा गाँधी ने कहा भी है .. पाप से घृणा करो.. पापियों से नहीं..

लेकिन हम तो एक पापी को चिह्नित कर अन्य सारे पापियों को मानों पुण्य़ात्मा होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं.. .

तभी तो वही दिल्ली आज भी वहीं की वहीं है, जहाँ पिछले १६ दिसम्बर को या उससे पहले हुआ करती थी.. .   या,  घटियही की घटनाएँ कुछ और वाचाल हो गयी हैं.. लेकिन वैसे नारे नहीं लगते आज..  क्यों ??

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