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लूट अकूत मची सगरे अरु ,छोड़त नाहि घरै अपना !
आपस में झगड़ाइ रहे सब ,पावत कौन रहा कितना !!
खीचत छीनत मारत पीटत,धो रहे जइसे पिटना!
होड़ मची इक दूसर से बस ,कौन बनावत है कितना !!

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on March 23, 2013 at 12:44pm

abharar adarneey ajay ji

Comment by Dr.Ajay Khare on March 23, 2013 at 12:23pm

pathak ji ati sunder badhai

Comment by ram shiromani pathak on March 23, 2013 at 12:20pm

 आदरणीय बृजेश कुमार सिंह जी,आदरणीय लक्षमण जी ,आदरणीया मीना जी , आदरणीय केवल प्रसाद जी  आप सभी को प्रणाम सहित हार्दिक आभार 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 22, 2013 at 9:36pm

प्रयास के लिए बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 22, 2013 at 9:28am

 आदरणीय श्री राम शरन पाठक जी, आपकी किरीट सवैया 'होड़'  बहुत प्यारी है, ढ़ेर सारी शुभ कामनाएं ।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 21, 2013 at 10:30pm

ati sunder

Comment by Meena Pathak on March 21, 2013 at 7:39pm

बहुते बढ़िया ... बधाई रउआ के पाठक जी 

Comment by बृजेश नीरज on March 21, 2013 at 7:02pm

बहुत सुन्दर! :))

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