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मैं तक़रीबन बीस साल बाद विदेश से अपने शहर लौटा था। बाज़ार में घूमते हुए सहसा मेरी नज़रें सब्ज़ी का ठेला लगाए एक वृद्ध पर जा टिकीं। बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान नहीं पा रहा था। लेकिन न जाने बार-बार ऐसा क्यों लग रहा था कि मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूँ। मेरी उत्सुकता उससे भी छुपी न रही। उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था। काफ़ी देर की ज़हनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन खिसक गई। जब मैं विदेश गया था तो इसकी एक बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी। नौकर-चाकर आगे-पीछे घूमा करते थे। धर्म-कर्म, दान-पुण्य में सबसे अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं ताऊ जी कहकर बुलाया करता था। वही आटा मिल का मालिक और आज सब्ज़ी का ठेला लगाने पर मजबूर? 
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुँधे गले से पूछा, “ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया?”
भरी आँखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख रुँधे गले से उसने उत्तर दिया, “बच्चे बड़े हो गए हैं, बेटे।”

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Comment by Mazhar Masood on November 21, 2010 at 11:54am
घर घर के सत्य को बहुत खूबसूरती से कहा है
Comment by SARA MISRA on November 21, 2010 at 2:34am
ye kaisa dard
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 20, 2010 at 12:44am
लघु कथा के तो सिद्ध हस्त रचनाकार हैं आप योगी भाई। क्या बात है। वाह।
Comment by Rash Bihari Ravi on November 19, 2010 at 3:59pm
sir ji aapne ek line me sab kuch kah diya hain , bahut badhia magar rulane wala
Comment by satish mapatpuri on November 19, 2010 at 3:54pm
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटे !"
इस एक लाइन ने बाप -बेटे के लोमहर्षक रिश्ते को तार -तार कर के रख दिया है. जन्मदिन पर आपने ये नायाब तोहफा दिया है. जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं.

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