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आइना

काश मैं एक आइना होता
हर पल हर घडी
तुझे देखता रहता
काश मैं एक आइना होता
तेरे चेहरे पर क्या लिखा है
तुझे यह बता देता और
दिन भर तेरे घर की
दीवारों पर झूलता
तेरे चेहरे की मुस्कान को
देखकर मुस्कुराता खिलखिलाता
काश मै एक आइना होता
आखिर एक दिन
उंचाई से फर्श पर
गिर कर टुकड़े टुकड़े हो जाता
तेरे लिए कुछ कर पाता
और जब जब तू उन टुकडो को
एक एक करके उठाती तो
बड़ा मज़ा आता
काश मैं एक आइना होता

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Comment by Admin on May 15, 2010 at 10:01am
अलीम जी एक बार फिर आप ने उम्द्दा ग़ज़ल प्रस्तुत किया है, देर से टिप्पणी देने के लिये मुआफी चाहता हु, धन्यवाद,
Comment by aleem azmi on May 13, 2010 at 9:25pm
shukriya aap sabhi ka hausala afzai ke liye ...
Comment by rajni chhabra on May 13, 2010 at 9:37am
bahut hi anuthaa andaaz hai

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 11, 2010 at 11:33pm
Bahut Badhiya Aleem bhai, bahut achha likha hai, Aaina hi aisa hai ki wo nahi badalta, tutaney key baad mey bhi aaina ka vajood nahi mitata, Tabhi to kisi sayer ney kaha hai ki.........
Aaina wahi rahata hai, Cheharey badal jaatey hai,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 11, 2010 at 11:13pm
ek baar fir labse arse baad aapki behtareen rachna aayi hai jiska tahe dil se swagat hai open books online ke manch par,.....
काश मैं एक आइना होता
हर पल हर घडी
तुझे देखता रहता
bahut hi badhiay aleem jee..........keep it up/.......
Comment by Ratnesh Raman Pathak on May 11, 2010 at 7:15pm
aazmi sahab aapne bahut badhiya aaina ka fayda bataya hai.lekin ek baat hai jo ki bilkul satya hai agar kuchh sach hai is dunia me to wo hai aaina kyoki jo dekhta hai wahi dikhata hai ,jara sa bhi beimani nahi karta hai sachmuch aaina ek anokhi cheej hai.................dhanyawad

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