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देखे हैं कभी तुमने,
पेड़ की शाखों पर वो पत्ते,

हरे-हरे, स्वच्छ, सुंदर, मुस्कुराते,
उस पेड़ से जुड़े होने का एहसास पाते,

उस एहसास के लिए,
खोने में अपना अस्तित्व
ना ज़रा सकुचाते,

पड़ें दरारें चाहे चेहरों पर उनके,
रिश्तों मे दरारें कभी वो ना लाते,

किंतु,

वही पत्ते जब सुख जाते,
किसी काम पेड़ों के जब आ ना पाते,

वही पत्ते उसी पेड़ द्वारा
ज़मीन पर गिरा दिए जाते,

लेते विदा उनसे,
यूँही मुस्कुराते,
सदा मुस्कुराते I

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Comment by Anita Maurya on December 11, 2010 at 4:33pm

bahut sundar.. jivan ke sach ka varnan ...

Comment by Veerendra Jain on November 30, 2010 at 11:05pm
bahut dhanyawad Navin bhaiya....
Comment by Veerendra Jain on November 29, 2010 at 11:18pm
dhanyawad ashish bhai..
Comment by Veerendra Jain on November 29, 2010 at 11:17pm
Tiwari sir...bahut bahut aabhar...aapko rachna pasand aayi...it means a lot...
Comment by आशीष यादव on November 29, 2010 at 10:42pm
Behatarin kawita sir, duniya ki rit ko kah diya aapne.

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