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आकंठ डूबे हुये हो क्यों,

अज्ञान तिमिर गहराता है।

ये तेरा ये मेरा क्यों ,

दिन ढलता जाता है।

 

क्यों सोई अलसाई  अंखियाँ,

न प्रकाश पुंज दिखाता है ।

जीवन मरण का फंदा ,

आ गलमाल बन लहराता है।

 

तब क्यों रोते हो,

जब सब छिनता जाता है।

खोलो ज्ञान चक्षु औ,

हटा दो तिमिर घनेरा।

फैले  पुंज प्रकाश का ,

होवे  दर्शन नयनाभिराम।

 

 

(अप्रकाशित एवं मौलिक)

Views: 449

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Comment by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 12:57am

धन्यवाद आप सभी को ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 3, 2013 at 12:20am

सुन्दर रचना.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 11:36pm

आपका भाव संप्रेषण श्लाघनीय है, आदरणीया

सादर

Comment by annapurna bajpai on May 29, 2013 at 12:14am

आप सबका हार्दिक आभार ।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 28, 2013 at 10:36pm

आ0 अन्नपूर्णा जी, सुन्दर भाव पूर्ण रचना। ’क्यों सोई अलसाई अंखियाँ,
न प्रकाश पुंज दिखाता है ।’ हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by Meena Pathak on May 27, 2013 at 4:20pm

खोलो ज्ञान चक्षु औ,

हटा दो तिमिर घनेरा।

फैले  पुंज प्रकाश का ,

होवे  दर्शन नयनाभिराम।

 
बहुत सुन्दर रचना अन्नपूर्णा जी ....... बधाई स्वीकारें 

Comment by Shyam Narain Verma on May 27, 2013 at 11:05am
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by annapurna bajpai on May 26, 2013 at 6:12pm

शुक्रिया अभिनव जी ।

Comment by Abhinav Arun on May 26, 2013 at 1:16pm

सन्देश परक रचना आदरणीया अन्नपूर्णा जी , बहुत शुभकामनाएं !!

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