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हरी भरी धरती मन मोहती है ,

चहुं ओर फैली हरियाली मोहती है ,

मुसकुराते खिले कुसुम मोहते हैं,

झूमते पेड़ पौधे मन मोहते है ।

 

अद्भुत है धरती का सौंदर्य ,

कल कल करती नदिया बहती ,

चम चम करते पोखर तालाब ,

अद्भुत अनुपम धरा है दिखती।

 

किन्तु .....................

ऐ! धरती पुत्र आज तो ,

धरती माँ न ऐसी दिखती है,

टप टप गिरते आँसू बस रोती है,

मेरा श्रंगार करो बस ये ही कहती है।

 

किन्तु आज .....................

न होता श्रंगार न लगते वृक्ष,

न सजती फूलों की है  क्यारी,

न मुसकुराते पौधे  न झूमते वृक्ष,

न ही नदिया अठखेलियाँ करती ।

 

किन्तु ये ........................

बस कटते है कटते ही जाते है,

कहने को वृक्ष धरा का भूषण है,

जीवन  दायिनी है,नदिया कहते है,

सूखती है बस सूखती है जाती है।

 

सोचो ................

न होंगे वृक्ष धरा पर,

न होगी जल की धार,

न होगे पर्वत धरा पर,

जो रूठ गई धरती तो क्या करोगे?

                                           - अन्नपूर्णा बाजपेई

 

अप्रकाशित एवं मौलिक    

 

 

 

 

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Comment by shalini rastogi on June 6, 2013 at 4:50pm

उत्तम प्रयास .. शुभकामनाएँ अन्नपूर्णा जी !

Comment by विजय मिश्र on June 6, 2013 at 10:31am
प्रकृति प्रेम की सुंदर प्रेरणा ,साधुवाद अन्नपूर्णाजी
Comment by विजय मिश्र on June 6, 2013 at 10:30am
प्रकृति प्रेम की सुंदर प्रेरणा . साधुवाद अन्नपूर्णाजी
Comment by Shyam Narain Verma on June 6, 2013 at 10:09am
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 6, 2013 at 9:52am
आदरणीया अन्नपूर्णा जी..बहुत ही सुंदर पंक्तियों का प्रस्तुतिकरण किया है आपने अपनी रचना में.."अद्धत है धरती का सौंदर्य कल कल करती नदियां बहती, चम चम करते पोखर तालाब अद्धत अनुपम धरा है दिखती । हार्दिक शुभकामनाऐं स्वीकार कीजीऐ ...आदरणीया..
Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 9:43am
आदरणीया अन्नपूर्णा जी बधाई बड़ी ही गहनता से प्रकाश डाला है आपने!
Comment by annapurna bajpai on June 6, 2013 at 9:30am

आदरणीय रविकर जी बहुत आभार आपका .

Comment by रविकर on June 6, 2013 at 9:14am

अति सुन्दर प्रयास-
शुभकामनायें आदरेया-

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