For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मेरे अपने कब थे तुम

मेरे अपने  कब थे तुम

गैरों के तुम सदा हुए 
सब्जबाग था प्यार तुम्हारा 
सारे वादे दगा हुए
दिल की बातें कह डाली है 
अपने कर्जे अदा हुए 
तुम निर्दोष हमेशा क्यों 
हम दोषी सर्वदा हुए 
मुझको ख़ारिज करने वाले 
ले हम तो अब दफा हुए 
                        अंजनी 
मौलिक एवम अप्रकाशित 

Views: 649

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by शुभांगना सिद्धि on June 8, 2013 at 2:24am

बहुत अच्छा 

Comment by Priyanka singh on June 8, 2013 at 1:05am

खूब .....

Comment by Anjini Rajpoot on June 7, 2013 at 7:11pm
आप सब का धन्यबाद मुझे बहुत अच्छा महसूस हुआ अपनी कविता यहा प्रस्तुत कर के 
मै और अच्छा लिखने की कोशिश करुगी एक बार फिर से धन्यवाद  
Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 2:36pm

यदि रचना को पोस्ट करने से पहले दुबारा देखा होता तो शायद सुधर कर और सुन्दर रूप में भाव व्यक्त हो जाते। सिर्फ तुक बिठाने के लिए शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रयोग किए जाने वाले शब्द की जरूरत पंक्ति को होनी चाहिए।
आपके इस प्रयास पर ढेरों बधाई!
सादर!

Comment by दिव्या on June 7, 2013 at 12:46pm
सब्जबाग था प्यार तुम्हारा 
सारे वादे दगा हुए........ बहुत खूब अंजनी जी 
Comment by Roshni Dhir on June 7, 2013 at 12:28pm

bahut khub

Comment by aman kumar on June 7, 2013 at 10:58am

बधाई आपको

Comment by Shyam Narain Verma on June 7, 2013 at 10:56am
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2013 at 9:41am

भावुकता को शब्द मिलें हैं... उसे तथ्य दें

शुभम्

Comment by वेदिका on June 7, 2013 at 12:21am

बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत की ...अन्जिनी जी!

मेरे अपने थे ही कब ...तुम गैरों के सदा हुए ...बखूबी !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service