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!!! कुण्डलियां !!!

तपता सूरज देख कर, मौसम है बेहाल।
तरू, उपवन, जन ताप से, नित.नित हुए हलाल।।
नित.नित हुए हलाल, निरूत्तर ठगे खडे़ हैं।
निर्वस्त्रहि भी ढाल, धर्म में डटे अड़े है।।
अब कालहु का काल, इन्द्र भगवन को जपता।
धरा करे चित्कार, जेठ सूरज सा तपता।।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 17, 2013 at 9:29pm

आ0  राजेश भाई जी,  आपका कथन उचित ही है, उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 17, 2013 at 9:24pm

आ0 रक्ताले सर जी, आपका कथन उपयुक्त ही है, सर जी!
तरू उपवन जन ताप से, नित.नित हुए हलाल।।....तरु टंकण त्रुटी है.यदि यहाँ वन लिखते तो उचित होता’जन.ताप’ वरना इसका अर्थ आप के कहे से भिन्न हो रहा है।....आप बिलकुल सही हैं।
नित.नित हुए हलाल...’नित-नित’ ‘नित-नित‘ करें...ऐसा ही है।
निर्वस्त्रहि भी ढाल....’निर्वस्त्रहि भी ढाल’ का क्या अर्थ समझें?.....बिना पत्तों के बृक्ष और गर्मी से बेहाल अर्धनग्न व्यक्ति से आशय है।
अब कालहु का काल.. ’काल को का काल’ उचित नहीं है...’कालों का काल‘ से आशय है
‘जेठ सूरज सा तपता‘ आपके द्वारा जिस तरह प्रयोग किया गया है उचित नहीं लगता..जी! जेठ सूरज ज्यों तपता। आपके उत्तम सुझावों के लिए आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 17, 2013 at 4:21pm

तपता सूरज देख कर, मौसम है बेहाल।
तरू, उपवन, जन ताप से, नित.नित हुए हलाल।।…….”तरु” टंकण त्रुटी है.यदि यहाँ वन लिखते तो उचित होता,”जन-ताप” वरना इसका अर्थ आप के कहे से भिन्न हो रहा है. 

नित.नित हुए हलाल, निरूत्तर ठगे खडे़ हैं।....... “नित.नित” “नित-नित” करें. 
निर्वस्त्रहि भी ढाल, धर्म में डटे अड़े है।।.........”निर्वस्त्रहि भी ढाल” का क्या अर्थ समझें?        
अब कालहु का काल, इन्द्र भगवन को जपता। “कालहु का काल” “काल को का काल” उचित नहीं है.
धरा करे चित्कार, जेठ सूरज सा तपता।।   “जेठ सूरज सा तपता” आपके द्वारा जिस तरह प्रयोग किया गया है उचित नहीं लगता.

आदरणीय केवल प्रसाद जी क्षमा करें किन्तु मुझे लगता है छंद में काफी सुधार की जरुरत है.सादर,

Comment by राजेश 'मृदु' on June 17, 2013 at 1:22pm

उत्‍तम रचना के लिए हार्दिक बधाई, मात्रा वाली रचना में मुश्किल आती ही है, ना चाहते हुए भी कुछ ना कुछ छूट जाता है । लेकिन यात्रा जारी रहे, बहुत  बधाई

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:30pm

आ0 कुन्ती जी,    उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:30pm

आ0 रामशिरोमणि भाई जी,    उत्साहवर्धन हेतु आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:28pm

आ0 विजयाश्री जी,    उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:27pm

आ0 अरून शर्मा भाई जी,   जी!  संशय में ध्यान भटक गया.....3+3+2+3+2  विषम पदों की रचना होती है।  समुचित मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2013 at 10:15pm

आ0 श्याम नारायण जी, उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by coontee mukerji on June 15, 2013 at 6:44pm

बहुत सुंदर  रचना केवल प्रसाद जी ...सादर / कुंती

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