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कल रविवार था ... 

फिर उदास, सूनी शाम थी ... 

देख रहा था

हल्की बारिश जो 

सब कुछ भिगो रही थी 

सामने पंछी रोशनदान 

मे छिपने का प्रयास कर रहे थे 

हवाएँ तेज चल रहीं थी 

जो आँधी, रुकने के बाद भी 

आँधी चलने का एहसास करा रही थी 

मैं खड़ा अपने आपको खोज रहा था 

सब कुछ फैला हुआ, तितर बितर था 

अतीत के पन्ने अब भी 

हवा मे तैर रहे थे 

कुछ गीले, कुछ फटे 

कुछ बिखरे पड़े थे 

सब कुछ ठहर गया था 

बारिश भी ... 

यह रोज होता है 

रोज आँधी आती है 

रोज बारिश होती है 

रोज अपने आपको खोजता हूँ

लेकिन यह उस दिन ज्यादा होता है

जब....

जब रविवार आता है .... 

(रविवार को मेरी माँ ने हम सभी को भौतिक रूप से अलविदा कहा था ... )

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 540

Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on July 3, 2013 at 7:40am

आभार प्राची जी आपका ... उत्साहवर्धन के लिए .... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2013 at 7:21am

मर्मस्पर्शी संवेदनाएं... 

मैं खड़ा अपने आपको खोज रहा था 

सब कुछ फैला हुआ, तितर बितर था 

अतीत के पन्ने अब भी 

हवा मे तैर रहे थे 

कुछ गीले, कुछ फटे 

कुछ बिखरे पड़े थे 

सब कुछ ठहर गया था ................बहुत सुन्दर शब्द चित्र 

सबके ह्रदय से कहीं न कहीं जुड़जाती , हामी पाती सी अभिव्यक्ति 

शुभकामनाएं. 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 1, 2013 at 9:38pm

आदरणीय जितेंद्र जी बहुत बहुत आभार ... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 1, 2013 at 9:37pm

आदरणीय मुकर्जी जी  आभार ... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 1, 2013 at 9:37pm

आदरणीय शुभंगना जी बहुत बहुत आभार .... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 1, 2013 at 9:35pm

आदरणीय विजय निकोर जी आभार .... 

Comment by vijay nikore on July 1, 2013 at 1:10am

सुन्दर भावाभिव्यक्ति।

बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by शुभांगना सिद्धि on June 30, 2013 at 8:33pm

भावुक और व्यथा 

Comment by coontee mukerji on June 30, 2013 at 3:53pm

दिल की व्यथा को बयाँ करते बहुत ही सुंदर प्रस्तुति.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 30, 2013 at 2:28pm
आदरणीय...अमोद जी, सुंदर रचना की प्रस्तुति पर हार्दिक शुभकामनाऐं स्वीकार करें...

कृपया ध्यान दे...

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