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नियमों की सरहदें

नियमों की सरहदें

 

उलझी हुई मानवीय अपेक्षाओं से अनछुआ

तुम्हारे लिए मेरा काल्पनिक अलोकित स्नेह

किसी सांचे में ढला हुआ नहीं था,

और न हीं वह पिंजरे में बंद पक्षी-सा

कभी सीमित या संकुचित था लगा।

 

एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हम

दो उन्मुक्त पक्षिओं-से थे,

कभी तुम चली आई उड़ कर पास मेरे,

और मैं गद-गद हो उठा, और कभी मैं

हर्षोन्माद में आ बैठा डाल पर तुम्हारी।

 

शैतान हँसी की हल्की-सी फुहार लिए,

तुमने मेरे लिए अपनी आँखें बिछा दीं

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली...

 

                      -------

                                      - विजय निकोर

                                        २५ जून, २०१३

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by अरुण कुमार निगम on July 3, 2013 at 8:57pm

आदरणीय विजय निकोर जी, सुंदर भावपूर्ण रचना के लिये बधाई.....

Comment by Priyanka singh on July 3, 2013 at 7:26pm

सुंदर.....बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2013 at 6:52pm
"उलझी हुई मानवीयअपेक्षाओं से अनछु आ

तुम्हारेलिए मेराकाल्पनिक अलोकित स्नेह

किसी सांचे में ढला हुआ नहीं था,

और न हीं वह पिंजरे में बंद पक्षी-सा

कभी सीमित या संकुचित था लगा।""...सुंदर रचना, भावनाओं से पूर्ण....."".तुमने मेरेलिए अपनी आँखें बिछा दीं

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पलमें

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली..."आदरणीय विजय जी, अति प्रेम में रिश्तों के नियमों की हद लांघ जाते है, यह वास्तविकता है! बहुत खूबसूरत प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 3, 2013 at 4:26pm

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली...ऐसा होता है | अंतर्मन में प्रेम के आगोश में सभी सरहदे लांघ जाना ही 

प्रेम का चरमोत्कर्ष तो है, जो आपकी रचना में परिलक्षित करने में आप सफल हुए है | इसके लिय हार्दिक 

बधाई स्वीकारे आदर्निय श्री विजय निकोरे जी | सादर 

Comment by बसंत नेमा on July 3, 2013 at 4:13pm

आ0 विजय जी बहुत सुन्दर रचना बधाई शुभकामनाये 

Comment by vijay nikore on July 3, 2013 at 2:26pm

 

 

आदरणीय राम जी:

 

//सुन्दर अति सुन्दर रचना //हार्दिक बधाई //

 

आपकी मनोहारी स्नेह मिश्रित प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार, राम जी।
 
सस्नेह,
विजय निकोर

 

 

Comment by ram shiromani pathak on July 3, 2013 at 2:04pm

शैतान हँसी की हल्की-सी फुहार लिए,

तुमने मेरे लिए अपनी आँखें बिछा दीं

और हम दोनों को लगा कि हमने

कल्पनातीत उस स्वर्णिम पल में

रिश्तों के नियमों की सरहदें लांघ ली.../////////वाह वाह आदरणीय विजय निकोर जी सुन्दर अति सुन्दर रचना //हार्दिक बधाई 

 

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