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!!!  अभिनव प्यार  !!!

 

प्रिया! जब तुम भूली,
तो मैं क्या लिखता ?
जब तुम थीं सब मेंरा था,
मैं याद भला क्या करता ?..... प्रिया! जब......

अब तुम नहीं पर प्यार तेरा,
मुझे बार बार दोहराता।
मैं भूल चला जीवन के पथ को,
स्मृति रोशन क्या करता ?...... प्रिया! जब...

पूर्ण अंधकार में इक जुगुनू,
इस झिलमिल जीवन को-
या अपनों से भूले रिश्तों का,
पथ प्रदर्शन क्या करता ?....... प्रिया! जब...

इस अभिनव प्यार संग,
द्वेष-भाव जो रखता।
ऐसे ठोस शिला हृदय में,
प्यार द्रवित क्या करता ?....... प्रिया! जब....

के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 6, 2013 at 6:47pm

आ0 विजय सर जी,  आपका स्नेह और आशीष पाकर मैं धन्य हो गया।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by vijay nikore on July 5, 2013 at 1:51pm

सुन्दर भाव-प्रस्तुति के लिए बधाई, आदरणीय केवल जी।

सादर,

विजय निकोर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 9:05am

आ0 बृजेश भाई जी,    आपके आत्मीय स्नेह और उत्साहवर्धन केलिए  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 9:01am

आ0 कुन्ती मैम जी,    आपके स्नेह भरे उत्साहित वचन से मैं आश्वस्त हुआ कि मेरी रचना सार्थक रही।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 8:51am

आ0 जितेन्द्र भाई जी,    आपका स्नेह और उत्साह पाकर हृदय पुलकित हो गया।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 8:49am

आ0 वेदिका जी,    आपका स्नेह और उत्साह पाकर हृदय पुलकित हो गया।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 8:46am

आ0 लड़ीवाला जी,    आपका स्नेह और आशीष पाकर मैं धन्य हो गया।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 8:43am

आ0 सौरभ सर जी,  जी!.. आपने दुःखती नब्ज पकड़ ली।  हा..हा!... जी सर!  बिलकुल सही बात है।  गीत लिखने में धुन और भाव के अनुरूप शब्दों का चयन बड़ा दुश्कर होता है।  इसलिए जो भी शब्द बन पड़ते हैं लिख जाता हूं। आपका स्नेह और आशीष पाकर मैं धन्य हो गया।  आपका तहेदिल से हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by aman kumar on July 5, 2013 at 8:29am

अब तुम नहीं पर प्यार तेरा, 
मुझे बार बार दोहराता।
मैं भूल चला जीवन के पथ को, 
स्मृति रोशन क्या करता ?...... प्रिया! जब...

प्रेम तो वो भाव है जिसको जितना छिपा लो पर रिसता है दर्द सीने के उठ कर आँखों तक आता है |

आभार 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 8:28am

आ0 माथुर जी, आपके स्नेह और समर्थन से मेरा उत्साह  दो गुना हो गया।  आपका बहुत-बहुत आभार।   सादर,

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