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प्रीत की रीत न कोई जाने [गीत ]

ऊद्धव कन्हैया से जाकर सिर्फ इतना बता दीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

उनकी खातिर दिलों जाँ लुटाया ।
और ज़माने को दुश्मन बनाया ।
उनके पीछे ये दुनिया भुलायी ।
उनकी राहों में पलकें बिछायी ।

उनके बिन बृज में क्या हो रहा है हाल सारा सुना दीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

उनके बिन अपनी हालत न पूछो ।
कैसी है दिल में चाहत न पूछो ।
हम तो मर मर के जीने लगे हैं ।
ज़हर अश्कों का पीने लगे हैं ।

दे रहे भेंट हम आंसुओं की चरणों में चढ़ा दीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

कह गये लौट आयेंगे परसों ।
बीत जायें न अब यूँ बरसों ।
एक घड़ी एक सदी बन गयी है ।
आँख हर एक  नदी बन गयी है ।

जो करके गए हमसे वादा याद उनको दिला दीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

पास होता अगर मन हमारा ।
सीखते योग हम भी तुम्हारा ।
लूट कर अपना सब ले गया वो ।
बदले में दर्द गम दे गया वो ।

जो खता जोगनों से हुयी हो आप भी प्रभु क्षमा कीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

बातें जब गोपियों ने सुनायी ।
ऊद्धव ने अपनी सुधि भी भुलायी ।
उनके चरणों में फिर गिर पड़े हैं ।
भूलकर ज्ञान प्रेमी बने हैं ।

बोले ऊद्धव हुनर प्रेम का अब कुछ हमे भी सिखा दीजियेगा ।
हे कृष्ण प्रेमी जनों की अब कुछ तो खबर लीजियेगा ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज

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Comment by Neeraj Nishchal on July 8, 2013 at 4:08pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया गीतिका जी

Comment by Neeraj Nishchal on July 8, 2013 at 4:06pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय जितेन्द्र भाई ।

Comment by वेदिका on July 7, 2013 at 6:23am

वाह! बहुत ही सुंदर गीत रचना की आपने आदरणीय नीरज जी!  

मैंने तो गाके ही इसको पढ़ा, कही भी प्रवाह बाधित नही लगा,!! 

उद्धव जी! को प्रेम की विद्या जरुर सीखनी चाहिए, अपनी राज नीति छोड़ कर। 

वरना अगर प्रेम उनके हाथ से निकल गया तो विरह की विद्या ही रह जाएगी सीखने को :))

सम्भल जाइये उद्धव जी! और प्रेम की क़द्र कीजिये!!

सुंदर अभिव्यक्ति के लिए शुभकामनाएं स्वीकारिये!!           

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 6, 2013 at 12:24pm
""उनकी खातिरदिलों जाँ लुटाया । और ज़माने को दुश्मन बनाया । उनके पीछे ये दुनिया भुलायी । उनकी राहोंमें पलकें बिछायी ।""......बहुत खूबसूरत प्रेमगीत आदरणीय..नीरज भाई जी, सच प्रेम में क्या कुछ नहीं हो जाता! अपनों को दुश्मन बना लेना, दुनियादारी भुला देना! ""कहगये लौटआयेंगे परसों । बीत जायें न अब यूँ बरसों । एक घड़ी एक सदी बन गयी है । आँख हर एक नदी बन गयी है ।"".....विरह तो विरह होती है,इक-इक दिन सदी समान! ""पास होता अगरमनहमारा । सीखते योग हम भी तुम्हारा । लूटकर अपना सब ले गया वो । बदलेमें दर्द गम दे गया वो ।"".......काश! हे ईश्वर, सब कुछ लूट ले गया वो...सभी को विरह में जीने की विद्या बता दो.......!आदरणीय..नीरज भाई, तहे दिल से बधाईया व शुभकामनाऐं

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