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चेहरे पर चेहरे जड़े हैं,

अक्स लोगों से बड़े हैं !

खो गई पहचान जब से 
जहाँ थे अब तक खड़े हैं !

अभी फूलों मे महक है 

इम्तहां आगे कड़े हैं !

ठोकरों से दोस्ती है ?
राह मे पत्थर पड़े हैं !

इन्हें कुछ कहना नहीं 
दर्द हैं ,चिकने घड़े हैं !
_______________प्रो. विश्वम्भर शुक्ल 

(मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by MAHIMA SHREE on July 11, 2013 at 10:31pm

ठोकरों से दोस्ती है ?
राह मे पत्थर पड़े हैं !

इन्हें कुछ कहना नहीं 
दर्द हैं ,चिकने घड़े हैं... क्या बात है !! बहुत-२ बधाई आपको

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:28pm

स्नेही बंधु राजेश कुमार झा साहब ,आपकी प्रतिक्रया स्नेह से भरी मुझे भी निरुत्तर कर गई न ! आपका प्रेम यूँ ही बना रहे ,यही कामना है !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:26pm

आपका हार्दिक आभार सराहनात्मक टिप्पणी के लिए सुश्री राजेश कुमारी जी !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:21pm

गीतिका 'वेदिका' जी आपको हार्दिक धन्यवाद रचना पसंद करने के लिए !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:20pm

वीनस केसरी जी 'गीतिका ' पसंद करने के लिए आभार आपका !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:19pm

मित्र अरुन शर्मा 'अनंत' जी आपका स्नेहिल धन्यवाद है !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 11, 2013 at 10:18pm

आपकी दृष्टि का आभार सौरभ पाण्डेय जी ,स्नेह सदैव प्रार्थित !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 2:50pm

कविता भाव पसंद आये, आदरणीय.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 11, 2013 at 11:55am

बहुत ही सुन्दर गीतिका आदरणीय हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 1:27am

सुन्दर गीतिका लिखी प्रोफ़ेसर साहब ...

हार्दिक बधाई

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